कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध-- पूर्वश्लीकर्में तीसरे प्रश्षका उत्तर देते हुए स्थितप्रज्ञके बैठनेका प्रकार बतलाकर अब उसमें होनेवाली शंकाओंका समाधान करनेके लिये अन्य प्रकारसे किये जानेवाले इन्द्रियसंयमकी अपेक्षा स्थितप्रज्ञके इन्द्रियसंयमकी विलक्षणता दिखलाते हैं-- विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन: । रसवर्ज रसो<प्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते,इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण न करनेवाले पुरुषके भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परंतु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुछ्षकी तो आसक्ति भी परमात्माका साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है?
arjuna uvāca | viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ | rasa-varjaṁ raso 'py asya paraṁ dṛṣṭvā nivartate ||
इंद्रियांद्वारे विषयांचा स्वीकार न करणाऱ्या पुरुषापासून विषय दूर होतात; पण त्यांचा ‘रस’—आसक्ती—उरते. परंतु ज्याने परम तत्त्वाचे दर्शन घेतले, त्याचा तो रसही निवृत्त होतो.
अजुन उवाच