त्रिभिस्ती&णैर्महावेगैरन्वगृह्नाच्छिर: शरै: | अर्जुनने “जो आज्ञा” कहकर इस कार्यके लिये प्रयत्न करना स्वीकार किया और गाण्डीव धनुष ले उसे अभिमन्त्रित करके झुकी हुई गाँठवाले तीन बाणोंको धनुषपर रखा। तत्पश्चात् भरतकुलके महात्मा महारथी भीष्मकी अनुमति ले उन अत्यन्त वेगशाली तीन तीखे बाणोंद्वारा उनके मस्तकको अनुगृहीत किया (कुछ ऊँचा करके स्थिर कर दिया) ।। ४३-४४ $ ।। अभिप्राये तु विदिते धर्मात्मा सव्यसाचिना
tribhis tīṇair mahāvegair anvagṛhnāc chiraḥ śaraiḥ |
संजय म्हणाला—अत्यंत वेगवान अशा तीन तीक्ष्ण बाणांनी अर्जुनाने भीष्मांचे मस्तक काळजीपूर्वक आधार देऊन थोडे उंच करून स्थिर केले। हे कृत्य पराभूत शत्रूवरचा विजयोल्लास नसून, रणभूमीतही क्षात्रधर्म व मान राखत पूज्य वृद्धावर केलेली करुण कर्तव्यसेवा होती।
संजय उवाच