Śākadvīpa–Pramāṇa–Varṇana
Measurements and Description of Śākadvīpa
आगच्छन्ति महाराज ततस्तिष्ठन्ति वै प्रजा: । वहाँ सब दिशाओंसे खुली हुई हवा आती है। उसे वे चारों दिग्गज ग्रहण करके रोक रखते हैं। फिर वे विकसित कमलसदृश परम कान्तिमान् शुण्डदण्डके अग्रभागसे उस हवाको सैकड़ों भागोंमें करके तुरंत ही सब ओर छोड़ते हैं, यह उनका नित्यका काम है। महाराज! साँस लेते हुए उन दिग्गजोंके मुखसे मुक्त होकर जो वायु यहाँ आती है, उसीसे सारी प्रजा जीवन धारण करती है ।। धृतराष्ट उवाच परो वै विस्तरो>त्यर्थ त्वया संजय कीर्तित:
dhṛtarāṣṭra uvāca | āgacchanti mahārāja tatas tiṣṭhanti vai prajāḥ | parō vai vistaro ’tyarthaṃ tvayā sañjaya kīrtitaḥ ||
धृतराष्ट्र म्हणाला—महाराज! प्रजा येते आणि मग आपल्या आपल्या ठिकाणी उभी राहते. संजय! तू हा विषय अत्यंत विस्ताराने सांगितलास।
धृतराष्ट उवाच