यज्ञवाटवैभववर्णनम् / Description of the Splendour of the Sacrificial Enclosure
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्चमेध-यज्ञका आरम्भविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८६ ॥। ऑपन-आक्राा बछ। अर: सप्ताशीतितमोब ध्याय: अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिछ्िरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राज्भदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन युधिष्ठिर उवाच श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत् त्वमहसि भाषितुम् । तन्मे5मृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो,युधिष्ठिर बोले--प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं। आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है
yudhiṣṭhira uvāca |
śrutaṃ priyam idaṃ kṛṣṇa yat tvam arhasi bhāṣitum |
tan me 'mṛtarasaṃ puṇyaṃ mano hlādayati prabho ||
युधिष्ठिर म्हणाले—प्रभो श्रीकृष्ण, मी हा प्रिय संदेश ऐकला; तो बोलण्यास योग्य तुम्हीच आहात. प्रभो, अमृतरसाने परिपूर्ण तुमचे हे पवित्र वचन माझे मन आनंदित करते.
युधिष्ठिर उवाच