अर्जुन–उलूपीसंवादः
Arjuna and Ulūpī: Explanation of Śānti and the Maṇipūra Resolution
किमयं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत । हयमेनं हरिष्यामि प्रयतस्व विमोक्षणे,“भरतनन्दन! इस घोड़ेके पीछे क्यों फिर रहे हो! यह तो ऐसा जान पड़ता है, मानो स्त्रियोंके बीच चल रहा हो। मैं इसका अपहरण कर रहा हूँ। तुम इसे छुड़ानेका प्रयत्न करो
vaiśampāyana uvāca | kim ayaṃ cāryate vājī strī-madhya iva bhārata | hayam enaṃ hariṣyāmi prayatasva vimokṣaṇe ||
“हे भरतनंदना! हा वाजी असा का फिरविला जातो— जणू स्त्रियांच्या मध्ये चालला आहे? मी हा घोडा पळवून नेतो; तू याला सोडविण्यास प्रयत्न कर.”
वैशम्पायन उवाच