Muñjavān on Himavat: Maheśvara’s abode, Śiva-stuti, and sacrificial gold
Chapter 8
त्रिपुरघ्नं त्रिनयनं त्रिलोकेशं महौजसम् । प्रभवं सर्वभूतानां धारणं धरणीधरम्,इस प्रकार उन पिनाकधारी, महादेव, महायोगी, अविनाशी, हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले, वरदायक, त्र्यम्बक, भुवनेश्वर, त्रिपुरासुरको मारनेवाले, त्रिनेत्रधारी, त्रिभुवनके स्वामी, महान् बलवान, सब जीवोंकी उत्पत्तिक कारण, सबको धारण करनेवाले, पृथ्वीका भार सँभालनेवाले, जगत्के शासक, कल्याणकारी, सर्वरूप, शिव, विश्वेश्वर, जगत्को उत्पन्न करनेवाले, पार्वतीके पति, पशुओंके पालक, विश्वरूप, महेश्वर, विरूपाक्ष, दस भुजाधारी, अपनी ध्वजामें दिव्य वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, गौरीश, ईश्वर, शितिकण्ठ, अजन्मा, शुक्र, पृथु, पृथुहर, वर, विश्वरूप, विरूपाक्ष, बहुरूप, उमापति, कामदेवको भस्म करनेवाले, हर, चतुर्मुख एवं शरणागतवत्सल महादेवजीको सिरसे प्रणाम करके उनके शरणापन्न हो जाना
tripuraghnaṁ trinayanaṁ trilokeśaṁ mahaujasam | prabhavaṁ sarvabhūtānāṁ dhāraṇaṁ dharaṇīdharam ||
मी त्रिपुरघ्न, त्रिनेत्रधारी, त्रिलोकेश्वर, महातेजस्वी—सर्वभूतांचा प्रभव, सर्वांना धारण करणारा, पृथ्वीचा भार सांभाळणारा—त्या महादेवाच्या शरण जातो।
संवर्त उवाच