सप्तहोतृ-विधानम् एवं इन्द्रिय–मनःसंवादः
The Seven Hotṛs and the Debate of Senses and Mind
यद्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम् । भोगान् भुद्क्ते भवान् सत्यं यथैतन्मन्यते तथा,हमारा लय हो जानेपर भी आप तृप्त रह सकें, जीवन धारण कर सकें और सब प्रकारके भोग भोग सकें तो आप जैसा कहते और मानते हैं, वह सब सत्य हो सकता है
yady asmāsu pralīneṣu tarpaṇaṁ prāṇadhāraṇam | bhogān bhunkte bhavān satyaṁ yathaitat manyate tathā ||
मन म्हणाले— आमचा लय झाला तरी तुम्ही तृप्त राहू शकला, प्राण धारण करू शकला आणि भोग उपभोगू शकला, तर तुम्ही जे म्हणता व मानता ते सत्य ठरू शकते।
मन उवाच