अध्याय ६ — युधिष्ठिरस्य वैराग्य-वाक्यं धृतराष्ट्रस्य वनगमनाभिलाषश्च
Chapter 6: Yudhiṣṭhira’s Renunciatory Appeal and Dhṛtarāṣṭra’s Resolve for the Forest
यदा स्वपक्षो बलवान् परपक्षस्तथाबल: । विगृहा शत्रून् कौन्तेय जेय: क्षितिपतिस्तदा,महाबाहो! पहले राजप्रधान बारह और मन्त्रिप्रधान साठ--इन बहत्तरका ज्ञान प्राप्त करके संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय--इन छ: गुणोंका यथावसर उपयोग किया जाता है। कुन्तीनन्दन! जब अपना पक्ष बलवान तथा शत्रुका पक्ष निर्बल जान पड़े, उस समय शत्रुके साथ युद्ध छेड़कर विपक्षी राजाको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये
yadā svapakṣo balavān parapakṣas tathābalaḥ | vigṛhya śatrūn kaunteya jeyaḥ kṣitipatis tadā, mahābāho |
धृतराष्ट्र म्हणाला—हे कुन्तीनंदना, महाबाहो! जेव्हा आपला पक्ष बलवान आणि परपक्ष तदनुरूप दुर्बल असेल, तेव्हा शत्रूंशी वैर धारण करून राजाने विरोधी नरेशाला जिंकण्याचा प्रयत्न करावा.
धघतयाट्र उवाच