Pūjya-namaskārya-prakaraṇa
On Those Worthy of Honor and Salutation
कर्तुमहसि तद् देव शिरसा त्वां प्रसादये । देव पुरंदर! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं इच्छानुसार विचरनेवाला तथा अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाला आकाशचारी देवता होऊँ। ब्राह्मण और क्षत्रियोंके विरोधसे रहित हो मैं सर्वत्र पूजा एवं सत्कार प्राप्त करूँ तथा मेरी अक्षय कीर्तिका विस्तार हो। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर आपकी प्रसन्नता चाहता हूँ। आप मेरी इस प्रार्थाकको सफल बनाइये ।। शक्र उवाच छन््दोदेव इति ख्यातः स्त्रीणां पूज्यो भविष्यसि
śakra uvāca | chandodeva iti khyātaḥ strīṇāṃ pūjyo bhaviṣyasi |
हे देव! हे करण्यास आपण समर्थ आहात; मी मस्तक नमवून आपली कृपा मागतो. शक्र म्हणाले—तू ‘छन्दोदेव’ या नावाने प्रसिद्ध होशील आणि स्त्रियांकडून पूज्य-सत्कृत होशील.
शक्र उवाच
The verse highlights how divine sanction (a boon or declaration) can confer social standing and a lasting identity—here, fame under a specific name and the duty/expectation of being worthy of honor.
Śakra (Indra) responds to a petitioner by granting a defining outcome: the person will be known as ‘Chandodeva’ and will receive reverence, specifically from women.