Adhyaya 27
Anushasana ParvaAdhyaya 2713 Verses

Adhyaya 27

Gaṅgā-māhātmya: Siddha–Śilavṛtti-saṃvāda and Gaṅgā-stava (गङ्गामाहात्म्यं—सिद्ध-शिलवृत्ति-संवादः)

Upa-parva: Tīrtha-mahātmya (Gaṅgā-stava Itihāsa Episode)

Vaiśaṃpāyana describes Bhīṣma’s eminence and the scene of his attendance by Yudhiṣṭhira and others after Gaṅgeya (Bhīṣma) has been struck down in battle. Numerous ṛṣis arrive to see Bhīṣma; Yudhiṣṭhira honors them in proper sequence, they converse pleasantly, and then vanish from sight, leaving the Pāṇḍavas reflective on their tapas. After this, Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to identify the most sanctifying regions, polities, hermitages, mountains, and rivers. Bhīṣma answers by introducing an ancient narrative: a siddha, after traversing the earth, visits a householder who lives by śiloñcha/śilavṛtti (subsisting on gleaned grains) and is received according to rite. The householder asks the same question, and the siddha replies that those lands are best through which the Bhāgīrathī Gaṅgā flows. A long stava follows, asserting Gaṅgā’s superiority over austerities and sacrifices for obtaining an auspicious ‘gati’, emphasizing purification through seeing, touching, bathing, drinking, and even uttering her name; it also includes merit claims regarding ancestral uplift, removal of sin, and the affective solace of Gaṅgā-darśana. The siddha concludes that Gaṅgā’s qualities are immeasurable and urges sustained devotion; Bhīṣma applies the lesson to Yudhiṣṭhira. The chapter closes with a phalaśruti: hearing or reciting this Gaṅgā-stava-itihāsa releases one from impurities (kilbiṣa).

Chapter Arc: शान्ति के बाद के उपदेश-प्रसंग में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे एक प्राचीन प्रश्न का उत्तर सुनें—ऐसे कौन-से कर्म हैं जो प्रत्यक्ष वध किए बिना भी ‘ब्रह्महत्या’ के तुल्य पाप बन जाते हैं। → भीष्म स्मरण कराते हैं कि उन्होंने कभी धर्म-निपुण व्यास से यह रहस्य पूछा था—अहिंसा का आवरण ओढ़कर भी ब्रह्मघ्नता कैसे घटित होती है। फिर वे एक-एक करके ऐसे सामाजिक-अन्याय गिनाते हैं: भूख से टूटे ब्राह्मण को ‘कुछ नहीं’ कहकर टालना, प्यास से व्याकुल गौओं के जल में बाधा डालना, योग्य वर होते हुए भी कन्या का विवाह न करना, ब्राह्मणों को अकारण मर्मभेदी शोक देना, असहाय/विकल ब्राह्मण की वस्तु हर लेना, और मोहवश आश्रम-वन-ग्राम-नगर में आग लगा देना। → सूची का नैतिक शिखर तब आता है जब ‘अहिंसा’ की परिभाषा उलट जाती है—यह स्पष्ट किया जाता है कि जीवन-रक्षा, आश्रय-रक्षा, अन्न-जल-रक्षा और ब्राह्मण-कल्याण में बाधा डालना भी ब्रह्मघात के समान है; पाप का केन्द्र ‘कर्म की हिंसा’ नहीं, ‘धर्म-रक्षा में विफलता’ बन जाता है। → भीष्म व्यास-वचन के आधार पर निष्कर्ष देते हैं कि जो व्यक्ति दीन, प्यासे, असहाय और धर्माश्रितों की रक्षा में बाधक बनता है, वह ब्रह्मघाती समझा जाए—क्योंकि वह समाज के धर्म-स्तम्भों को गिराता है। → अगले उपदेश के लिए संकेत रहता है कि अब इन पापों के प्रायश्चित्त/दान-धर्म और प्रतिकार-धर्म की विधियाँ आगे कही जाएँगी।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८३ श्लोक मिलाकर कुल १११३ “लोक हैं) न२्च्स्स्््तसािस्सि (9) ४२ >>, - जब कोई अपनी कन्याको इस शर्तपर ब्याहता है कि 'इससे जो पहला पुत्र होगा, उसे मैं गोद ले लूँगा और अपना पुत्र मानूँगा” तो उसे “पुत्रिकाधर्मके अनुसार विवाह” कहते हैं। इस नियमसे प्राप्त होनेवाला पुत्र श्राद्धका अधिकारी नहीं है। चतुर्विशो$ध्याय: ब्रह्महत्याके समान पापोंका निरूपण युधिछिर उवाच इदं मे तत्त्वतो राजन्‌ वक्तुमहसि भारत । अहिंसयित्वापि कथं ब्रह्म॒हत्या विधीयते,युधिष्ठिरने पूछा--भरतवंशी नरेश! अब आप मुझे यह ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें कि ब्राह्मणकी हिंसा न करनेपर भी मनुष्यको ब्रह्महत्याका पाप कैसे लगता है?

युधिष्ठिर म्हणाला—हे राजन्, भरतवंशी! मला तत्त्वतः सांगा: ब्राह्मणाची हिंसा न करताही ‘ब्रह्महत्या’ हे पाप मनुष्याला कसे लागते?

Verse 2

भीष्म उवाच व्यासमामन्त्रय राजेन्द्र पुरा यत्‌ पृष्टवानहम्‌ । तत्ते5हं सम्प्रवक्ष्यामि तदिहैकमना: शृणु,भीष्मजीने कहा--राजेन्द्र! पूर्वकालमें मैंने एक बार व्यासजीको बुलाकर उनसे जो प्रश्न किया था (तथा उन्होंने मुझे उसका जो उत्तर दिया था), वह सब तुम्हें बता रहा हूँ। तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो

भीष्म म्हणाला—राजेंद्र! पूर्वी मी व्यासांना बोलावून जो प्रश्न विचारला होता (आणि त्यांनी जो उत्तर दिला), तोच विषय मी तुला सांगतो. येथे एकाग्र मनाने ऐक।

Verse 3

चतुर्थस्त्वं वसिष्ठस्य तत्त्वमाख्याहि मे मुने । अहिंसयित्वा केनेह ब्रह्महत्या विधीयते,मैंने पूछा था--'मुने! आप वसिष्ठजीके वंशजोंमें चौथी पीढ़ीके पुरुष हैं। कृपया मुझे यह ठीक-ठीक बताइये कि ब्राह्मणकी हिंसा न करनेपर भी किन कर्मोके करनेसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है?”

मी विचारले होते—“मुने! आपण वसिष्ठांच्या वंशातील चौथ्या पिढीतील आहात. कृपया मला तत्त्वतः सांगा: ब्राह्मणाची हिंसा न करताही येथे कोणत्या कर्मांनी ब्रह्महत्येचे पाप लागते?”

Verse 4

इति पृष्टो मया राजन्‌ पराशरशरीरज: । अब्रवीन्निपुणो धर्मे नि:संशयमनुत्तमम्‌,राजन! मेरे द्वारा इस प्रकार पूछनेपर पराशर-पुत्र धर्मनिपुण व्यासजीने यह संदेहरहित परम उत्तम बात कही--

राजन्! मी अशा प्रकारे विचारल्यावर पराशरतनय, धर्मनिपुण व्यासांनी निःसंशय असे परम उत्तम वचन सांगितले।

Verse 5

ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थे कृशवृत्तिनम्‌ । ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात्तं विद्याद्‌ ब्रह्मघातिनम्‌,'भीष्म! जिसकी जीविकावृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे ब्राह्मणको भिक्षा देनेके लिये स्वयं बुलाकर जो पीछे देनेसे इनकार कर देता है, उसे ब्रह्महत्यारा समझो

भीष्म म्हणाले—ज्याची उपजीविका क्षीण झाली आहे अशा ब्राह्मणाला भिक्षा देण्यासाठी स्वतः बोलावून, नंतर ‘काही नाही’ असे म्हणून नकार देतो, त्याला ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 6

मध्यस्थस्येह विप्रस्थ योडनूचानस्थ भारत । वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तं विद्याद्‌ ब्रह्मघातिनम्‌,“भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य तटस्थ रहनेवाले विद्वान्‌ ब्राह्मणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा ही समझना चाहिये

भीष्म म्हणाले—भरतनंदना! जो दुर्बुद्धी मनुष्य येथे तटस्थ व विद्वान ब्राह्मणाची उपजीविका हिरावून घेतो, त्याला ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 7

गोकुलस्य तृषार्तस्य जलार्थे वसुधाधिप । उत्पादयति यो विषध्नं त॑ विद्याद्‌ ब्रह्मघातिनम्‌,'पृथ्वीनाथ! जो प्याससे पीड़ित हुई गौओंके पानी पीनेमें विघ्न डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती जाने

भीष्म म्हणाले—वसुधाधिप! तहानलेलेल्या गायींच्या पाण्यासाठीच्या प्रयत्नात जो विघ्न निर्माण करतो, त्याला ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 8

यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक्‌ शास्त्र वा मुनिभि: कृतम्‌ । दूषयत्यनभिज्ञाय त॑ विद्याद्‌ ब्रह्मघातिनम्‌,'जो मनुष्य उत्तम कर्मका विधान करनेवाली श्रुतियों और ऋषिप्रणीत शास्त्रोंपर बिना समझे-बूझे दोषारोपण करता है, उसको भी ब्रह्मघाती ही समझो

भीष्म म्हणाले—जो मनुष्य यथार्थ ज्ञान नसताना, उत्तम कर्माचे विधान करणारी श्रुती किंवा मुनींनी रचलेले शास्त्र यांची निंदा करतो, त्याला ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 9

आत्मजां रूपसम्पन्नां महतीं सदृशे वरे | न प्रयच्छति य: कन्यां त॑ विद्याद्‌ ब्रद्मघातिनम्‌,जो अपनी रूपवती कन्याकी बड़ी उम्र हो जानेपर भी उसका योग्य वरके साथ विवाह नहीं करता, उसे ब्रह्महत्यारा जाने

भीष्म म्हणाले—जो मनुष्य आपल्या रूपसंपन्न कन्येचे वय झाल्यावरही तिला योग्य वरास देत नाही, त्याला ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 10

अधर्मनिरतो मूढो मिथ्या यो वै द्विजातिषु । दद्यान्मर्मातिगं शोकं त॑ विद्याद्‌ ब्रद्मघातिनम्‌

भीष्म म्हणाले—जो मूढ मनुष्य अधर्मात रत होऊन द्विजांविषयी खोटी निंदा करतो व मर्मभेदी शोक देतो, त्याला ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 11

“जो पापपरायण मूढ़ मनुष्य ब्राह्मणोंको अकारण ही मर्मभेदी शोक प्रदान करता है, उसे ब्रह्मघाती जाने ।। चक्षुषा विप्रहीणस्य पंगुलस्य जडस्य वा । हरेत यो वै सर्वस्वं त॑ विद्याद्‌ ब्रहद्मघातिनम्‌,“जो अन्धे, लूले और गूँगे मनुष्योंका सर्वस्व हर लेता है, उसे ब्रह्मघाती जाने

भीष्म म्हणाले—जो पापपरायण मूढ मनुष्य ब्राह्मणांना कारण नसताना मर्मभेदी शोक देतो, त्याला ब्रह्मघाती समजावे। तसेच जो आंधळ्या, लंगड्या किंवा जडबुद्धी असहायाचा सर्वस्व हरण करतो, त्यालाही ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 12

आश्रमे वा वने वापि ग्रामे वा यदि वा पुरे । आअन्मनिं समुत्सूजेन्मोहात्तं विद्याद्‌ ब्रह्मघातिनम्‌,“जो मोहवश आश्रम, वन, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती ही समझना चाहिये'

भीष्म म्हणाले—आश्रमात, वनात, गावात किंवा नगरात—जो कोणी मोहाने आग लावतो, त्याला ब्रह्मघाती समजावे।

Verse 24

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानथधर्मपर्वणि ब्रह्मघ्नक थने चतुर्विशो5ध्याय:

अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात ब्रह्मघ्न-कथनविषयक चोवीसावा अध्याय समाप्त झाला।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks which places—countries, polities, hermitages, mountains, and rivers—are foremost in sanctity; the teaching reframes the inquiry as guidance on where and how dharma is practically cultivated through tīrtha association.

The chapter presents Gaṅgā as a paradigmatic locus where intention (śraddhā), practice (bathing/seeing/remembering), and moral transformation converge, portraying purification as both ritual and ethical reorientation.

Yes. The closing statement asserts that one who hears or recites this sacred itihāsa combined with Gaṅgā’s praise is released from impurities (sarva-kilbiṣa), functioning as a formal phalaśruti.