Āśramadharma and the Marks of the Muni
Yayāti–Aṣṭaka Saṃvāda
परिसंख्याय कालज्ञ: कला: काष्छाश्न वीर्यवान् | यौवन प्राप्य राजर्षि: सहस्रपरिवत्सरान्,वे नरेश शुभ भोगोंको प्राप्त करके पहले तो तृप्त एवं आनन्दित होते थे; परंतु जब यह बात ध्यानमें आती कि ये हजार वर्ष भी पूरे हो जायँगे, तब उन्हें बड़ा खेद होता था। कालतत्त्वको जाननेवाले पराक्रमी राजा ययाति एक-एक कला और काष्ठाकी गिनती करके एक हजार वर्षके समयकी अवधिका स्मरण रखते थे। राजर्षि ययाति हजार वर्षोकी जवानी पाकर नन्दनवनमें विश्वाची अप्सराके साथ रमण करते और प्रकाशित होते थे। वे अलकापुरीमें तथा उत्तर दिशावर्ती मेरशिखरपर भी इच्छानुसार विहार करते थे। धर्मात्मा नरेशने जब देखा कि समय अब पूरा हो गया, तब वे अपने पुत्र पुरुके पास आकर बोले --
parisaṅkhyāya kālajñaḥ kalāḥ kāṣṭhāś ca vīryavān | yauvanaṃ prāpya rājarṣiḥ sahasra-parivatsarān ||
वैशंपायन म्हणाले—काळ जाणणारा पराक्रमी राजर्षी ययाती हजार वर्षांचे यौवन प्राप्त करून, कला व काष्ठा अशा सूक्ष्म कालविभागांची गणना करून त्या अवधिचे माप मनात धरून असे. शुभ भोगांनी संतुष्ट असूनही जेव्हा जेव्हा त्याला आठवे की ही हजार वर्षेही अपरिहार्यपणे संपतील, तेव्हा त्याला गाढ खेद होई; कारण जगातील भोग काळाने मर्यादित आहेत, म्हणून ते तृष्णेचा अंत करू शकत नाहीत.
वैशम्पायन उवाच
Even extraordinary enjoyment is limited by time; awareness of time’s completion exposes the insufficiency of sense-pleasure to end longing, pointing toward restraint and higher aims.
Yayāti, having obtained a thousand years of youth, keeps track of its passing by counting subtle time-units (kalā and kāṣṭhā), and the thought that the term will end brings him sorrow despite his pleasures.