ययाति–देवयानी संवादः
Yayāti–Devayānī Dialogue and Śukra’s Consent
मैवं शुचो मा रुद देवयानि न त्वादृशी मर्त्यमनुप्रशोचते । यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्न सेन्द्रा देवा वसवो5थाश्विनौ च,शुक्राचार्यने कहा--बेटी! बृहस्पतिके पुत्र कच मर गये। मैंने विद्यासे उन्हें कई बार जिलाया, तो भी वे इस प्रकार मार दिये जाते हैं, अब मैं क्या करूँ। देवयानी! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम-जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगतके प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाय, तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा (अत: उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है)
māivaṁ śuco mā ruda devayāni na tvādṛśī martyam anuprśocate | yasyās tava brahma ca brāhmaṇāś ca sendrā devā vasavo 'thāśvinau ca ||
शुक्राचार्य म्हणाले—देवयानी, असा शोक करू नकोस; रडू नकोस. तुझ्यासारखी सामर्थ्यवान स्त्री नश्वरासाठी विलाप करत नाही. तुझ्याकडे ब्रह्मविद्या आहे आणि ब्राह्मणांचा आधार आहे; इंद्रासह देव, वसु आणि दोन्ही अश्विनही आदराने नतमस्तक होतात.
शुक्र उवाच
Śukra urges restraint in grief by emphasizing mortality and the ideal of composure for one endowed with spiritual power and high standing; lamentation is presented as unfitting when one is supported by sacred knowledge and revered by divine beings.
Śukra addresses Devayānī to stop weeping, asserting that someone like her should not mourn a mortal; he underscores her (and his) spiritual authority by invoking Brahmins and major gods (Indra, the Vasus, the Aśvins) as witnesses to that stature.