Duḥṣantasya Vana-praveśaḥ
King Duḥṣanta’s Entry into the Forest Hunt
अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् । धातारमजमव्यक्तं यमाहु: परमव्ययम्,आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्मुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है। वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं
anantam acalaṁ devaṁ haṁsaṁ nārāyaṇaṁ prabhum | dhātāram ajam avyaktaṁ yam āhuḥ param avyayam ||
दाश म्हणाला—त्याला अनंत व अचल—देव, हंस, नारायण, प्रभु; धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर व अव्यय असे म्हणतात. तोच अंतरात्मा व अव्यय तत्त्व; तोच प्रकृती (उपादान), उत्पत्तीचे कारण, अधिष्ठाता प्रभु, अंतर्वर्ती पुरुष आणि विश्वकर्मा आहे. सत्त्वगुणाने प्राप्त होणारा व प्रणव ‘ॐ’ ने सूचित असा तो अनादि, जन्मरहित, अविकारी, सर्वव्यापी—परम पुरुष, परमात्मा—सर्वांचा कर्ता व सर्व भूतांचा पितामह आहे.
दाश उवाच
The verse teaches the supremacy and all-pervading nature of Nārāyaṇa: He is unborn, unmanifest, imperishable, both the sustaining ground of the cosmos and its inner ruler. The many epithets emphasize that the highest reality can be approached through purity (sattva) and is indicated by Oṁ.
The speaker (Dāśa) delivers a hymn-like description of the Supreme Being, listing revered names and philosophical attributes to identify Nārāyaṇa as the ultimate source, support, and indwelling controller of all beings.