Aṃśāvataraṇa-kathana (Catalog of Divine/Asuric Portions in Human Births) — Chapter 61
राज्यं विहतभूयिष्ठं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवा: । एवमेतत् पुरावृत्तं तेषामक्लिष्टकर्मणाम् | भेदो राज्यविनाशाय जयशक्ष जयतां वर,महाराज! जब इस प्रकार न्यायपूर्वक माँगनेपर भी उन्हें राज्य नहीं मिला, तब दोनों दलोंमें युद्ध छिड़ गया। फिर तो पाण्डव-वीरोंने क्षत्रियकुलका संहार करके राजा दुर्योधनको भी मार डाला और अपने राज्यको, जिसका अधिकांश भाग उजाड़ हो गया था, पुनः अपने अधिकारमें कर लिया। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनममेजय! अनायास महान् कर्म करनेवाले पाण्डवोंका यही पुरातन इतिहास है। इस प्रकार राज्यके विनाशके लिये उनमें फ़ूट पड़ी और युद्धके बाद उन्हें विजय प्राप्त हुई
rājyaṃ vihatabhūyiṣṭhaṃ pratyapadyanta pāṇḍavāḥ | evam etat purāvṛttaṃ teṣām akliṣṭakarmaṇām | bhedo rājyavināśāya jayaśakṣa jayātāṃ vara janamejaya mahārāja |
पांडवांनी आपले राज्य पुन्हा मिळविले, जरी त्याचा बहुतांश भाग नष्ट झाला होता. हा त्या अक्लिष्टकर्मा वीरांचा प्राचीन वृत्तांत आहे. हे जनमेजय, विजयी वीरांमध्ये श्रेष्ठ! राज्यविनाशासाठी भेद उत्पन्न झाला; पण युद्धानंतर त्यांनी विजयासह आपले राज्य पुन्हा प्राप्त केले.
वैशम्पायन उवाच