Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् | तपस्विनमतीवाथ त॑ मुनिप्रवरं नूप,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
janamejaya uvāca | vahantaṁ rājaśārdūla skandhenānapakāriṇam | tapasvinam atīvātha taṁ munipravaraṁ nṛpa ||
जनमेजय म्हणाला—राजशार्दूल, राजेंद्र! तो मुनिप्रवर निरपराध असूनही खांद्यावर निरुपद्रवी जीव वाहत होता; तरीही मौन-समाधीत स्थित त्या मुनिश्रेष्ठ तपस्व्याचा तुमच्या पिता परीक्षिताने अपमान केला आणि त्याच्या खांद्यावर मृत सर्प ठेवला.
जनमेजय उवाच
Even a powerful king must uphold dharma by showing restraint and reverence toward ascetics; insulting an innocent, self-controlled sage is an ethical failure that invites grave consequences.
Janamejaya recounts the incident that provoked Śṛṅgī: King Parīkṣit, angered by the sage’s silence, placed a dead snake on the sage’s shoulder—an act of disrespect that leads to the famous curse and sets the stage for the snake-sacrifice narrative.