Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
480 पक यस्य दास्यामि यातनाम् | एकं तु 4 तद् वृत्तं निर्जने वने,अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोके नाशका विचार करूँगा
Janamejaya uvāca: “Bhaviṣyāmi prayatnapūrvakaṁ ko’pi upāyaṁ kṛtvā Takṣakaṁ etad-arthaṁ daṇḍayiṣyāmi. Kintu ekaṁ śrotum icchāmi—Nāgarāja-Takṣakasya Kāśyapa-brāhmaṇasya ca saṁvādaḥ nirjane vane abhavat. Tat sarvaṁ vṛttāntaṁ kena dṛṣṭaṁ śrutaṁ ca? Yuṣmākaṁ samīpaṁ eṣā kathā katham āgatā? Etat śrutvāhaṁ sarpāṇāṁ nāśaṁ prati cintayiṣyāmi.”
जनमेजय म्हणाला—पुढे मी प्रयत्नपूर्वक काही उपाय करून तक्षकाला नक्कीच दंड देईन. पण एक गोष्ट ऐकू इच्छितो—निर्जन वनात तक्षक आणि काश्यप ब्राह्मण यांचा जो संवाद झाला, तो कोण पाहिला-ऐकला? तो वृत्तांत तुमच्यापर्यंत कसा पोहोचला? हे ऐकूनच मी सर्पनाशाचा निश्चय करीन.
जनमेजय उवाच