Ādi Parva, Adhyāya 178 — Royal Contestants Assemble; Cosmic Witnesses; The Bow Remains Unstrung
ऊरुणैकेन वामोरुर्भ्तु: कुलविवृद्धये । तद् गर्भमुपलभ्याशु ब्राह्मणी या भयार्दिता,तदनन्तर भृगुवंशियोंके गर्भस्थ बालकोंकी भी हत्या करते हुए वे क्रोधान्ध क्षत्रिय सारी पृथ्वीपर विचरने लगे। इस प्रकार भृगुवंशका उच्छेद आरम्भ होनेपर भृगुवंशियोंकी पत्नियाँ उस समय भयके मारे हिमालयकी दुर्गम कन्दरामें जा छिपीं। उनमेंसे एक स्त्रीने अपने महान् तेजस्वी गर्भकों भयके मारे एक ओरकी जाँघको चीरकर उसमें रख लिया। उस वामोरुने अपने पतिके वंशकी वृद्धिके लिये ऐसा साहस किया था। उस गर्भका समाचार जानकर कोई ब्राह्मणी बहुत डर गयी और उसने शीघ्र ही अकेली जाकर क्षत्रियोंके समीप उसकी खबर पहुँचा दी। फिर तो वे क्षत्रियलोग उस गर्भकी हत्या करनेके लिये उद्यत हो वहाँ गये
ūrūṇāikena vāmorur bhartuḥ kulavivṛddhaye | tad garbham upalabhyāśu brāhmaṇī yā bhayārditā ||
वसिष्ठ म्हणाले—वामोरू त्या स्त्रीने पतीच्या वंशवृद्धीसाठी एका जांघेच्या आधाराने ते धैर्यकर्म केले. पण त्या गर्भाचा भेद लवकरच उघड होताच भयाने व्याकुळ झालेली एक ब्राह्मणी एकटीच क्षत्रियांकडे जाऊन ती वार्ता सांगून आली. ते ऐकताच गर्भस्थ बालकाचा वध करण्यास उद्यत झालेले ते क्षत्रिय तिकडे निघाले.
वसिष्ठ उवाच
The verse highlights the ethical tension between protecting lineage and the corrosive power of fear: courageous efforts to preserve a family line are endangered when fear leads to betrayal, and when violence targets even the unborn—an extreme adharma that signals social collapse.
A woman (called vāmorū) has concealed her pregnancy in her thigh to preserve her husband’s lineage. When the pregnancy is discovered, a frightened Brahmin woman informs the Kṣatriyas, who then rush to kill the fetus.