Amṛta-Pāna, Rāhu’s Detection, and the Sudarśana Intervention (अमृतपान-राहुप्रकाशन-सुदर्शनप्रयोगः)
तत्र नारायणो देवो ब्रह्माणमिदमब्रवीत् । चिन्तयत्सु सुरेष्वेवं मन्त्रयत्सु च सर्वश:,उसके शुभ एवं उच्चतम शृंग असंख्य चमकीले रत्नोंसे व्याप्त हैं। वे अपनी विशालताके कारण आकाशके समान अनन्त जान पड़ते हैं। समस्त महातेजस्वी देवता मेरुगिरिके उस महान् शिखरपर चढ़कर एक स्थानमें बैठ गये और सब मिलकर अमृत- प्राप्तिके लिये क्या उपाय किया जाय, इसका विचार करने लगे। वे सभी तपस्वी तथा शौच- संतोष आदि नियमोंसे संयुक्त थे। इस प्रकार परस्पर विचार एवं सबके साथ मन्त्रणामें लगे हुए देवताओंके समुदायमें उपस्थित हो भगवान् नारायणने ब्रह्माजीसे यों कहा--“समस्त देवता और असुर मिलकर महासागरका मन्थन करें। उस महासागरका मन्न्थन आरम्भ होनेपर उसमेंसे अमृत प्रकट होगा
tatra nārāyaṇo devo brahmāṇam idam abravīt | cintayatsu sureṣv evaṁ mantrayatsu ca sarvaśaḥ ||
त्याच वेळी, देवता सर्व बाजूंनी असा विचार व मंत्रणा करीत असताना, भगवान नारायण ब्रह्माजींना म्हणाले—“देव आणि असुरांनी मिळून महासागराचे मंथन करावे; मंथन सुरू होताच त्यातून अमृत प्रकट होईल.”
शौनक उवाच