Ādi Parva, Adhyāya 146 — Brāhmaṇī’s counsel on grief, duty, and protection of children
अपन करा बछ। ऑफ कातज ३. यहाँ संकेतसे यह बात बतायी गयी है कि शत्रुओंने तुम्हारे लिये एक ऐसा भवन तैयार करवाया है, जो आगको भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है। शस्त्रका शुद्धरूप सस्त्र है, जिसका अर्थ घर होता है। २. तात्पर्य यह है, वहाँ जो तुम्हारा पार्श्ववर्ती होगा, वह पुरोचन ही तुम्हें आगमें जलाकर नष्ट करना चाहता है। तुम उस आगसे बचनेके लिये एक सुरंग तैयार करा लेना। कक्षघ्नका शुद्ध रूप कुक्षिघ्न है, जिसका अर्थ है कुक्षिचर या पार्श्ववर्ती। 3. अर्थात् दिशा आदिका ठीक ज्ञान पहलेसे ही कर लेना, जिससे रातमें भटकना न पड़े। ४. तात्पर्य यह कि उस सुरंगसे यदि तुम बाहर निकल जाओगे तो लाक्षागृहमें लगी हुई आगसे बच सकोगे। ५. अर्थात् यदि तुम पाँचों भाई एकमत रहोगे तो शत्रु तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। पजञज्चचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका और युधिछिर र्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठि एवं भीमसेनकी बातचीत वैशम्पायन उवाच ततः सर्वा: प्रकृतयो नगराद् वारणावतात् । सर्वमड्नलसंयुक्ता यथाशास्त्रमतन्द्रिता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके शुभागमनका समाचार सुनकर वारणावत नगरसे वहाँके समस्त प्रजाजन अत्यन्त प्रसन्न हो आलस्य छोड़कर शास्त्रविधिके अनुसार सब तरहकी मांगलिक वस्तुओंकी भेंट लेकर हजारोंकी संख्यामें नाना प्रकारकी सवारियोंके द्वारा उनकी अगवानीके लिये आये
vaiśampāyana uvāca |
tataḥ sarvāḥ prakṛtayo nagarād vāraṇāvatāt |
sarvamaṅgalasaṃyuktā yathāśāstram atandritāḥ ||
वैशंपायन म्हणाले— त्यानंतर वारणावत नगरातील सर्व प्रजाजन, सर्व प्रकारच्या मंगलभावनेने युक्त आणि शास्त्रोक्त विधीनुसार आळस न करता, पांडवांच्या शुभ आगमनाची वार्ता ऐकून अत्यंत आनंदित झाले. त्यांनी विधिपूर्वक मंगलद्रव्ये व भेटवस्तू घेऊन, नानाविध वाहनांवर सहस्रोंच्या संख्येने नगराबाहेर येऊन त्यांच्या स्वागत-सत्कारासाठी प्रस्थान केले.
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights social dharma: a community expresses righteousness through disciplined, śāstra-aligned hospitality and auspicious conduct toward honored guests. Ethical order is shown outwardly through proper rites and diligence.
The citizens of Vāraṇāvata come out to welcome the Pāṇḍavas with auspicious preparations and formal observances, setting the public scene just before the concealed danger associated with their stay there.