भीमस्य जलान्वेषणं तथा वनविश्रान्तिः
Bhīma’s Search for Water and the Forest Halt
ट्रुपदस्य शरा घोरा विचेरु: सर्वतो दिशम् । ततः शड्खाश्न भेर्यश्व मृदड़ाश्न सहस्रश:,धनुर्ज्यातलशब्दश्न संस्पृश्य गगनं महान् | द्रपदके भयंकर बाण सब दिशाओंमें विचरने लगे। महाराज! उनकी विजय होती देख पांचालोंके घरोंमें शंख, भेरी और मृदंग आदि सहस्रों बाजे एक साथ बज उठे। महान् आत्मबलसे सम्पन्न पांचाल-सैनिकोंका सिंहनाद बड़े जोरोंसे होने लगा। साथ ही उनके धनुषोंकी प्रत्यंचाओंका महान् टंकार आकाशमें फैलकर गूँजने लगा
drupadasya śarā ghorā viceruḥ sarvato diśam | tataḥ śaṅkhaś ca bheryaś ca mṛdaṅgāś ca sahasraśaḥ, dhanurjyātalaśabdaś ca saṃspṛśya gaganaṃ mahān ||
द्रुपदाचे भयंकर बाण सर्व दिशांना फिरू लागले. महाराज, त्याचा विजय दिसताच पांचालांच्या निवासांत शंख, भेरी, मृदंग इत्यादी सहस्र वाद्ये एकाच वेळी निनादली; महात्मा पांचालांचा सिंहनाद घुमला आणि धनुष्यांच्या प्रत्यंचांचा महान् टंकार आकाश व्यापून दूरवर प्रतिध्वनित झाला।
वैशम्पायन उवाच