धृतराष्ट्र–दुर्योधन संवादः
Vāraṇāvata-vivāsana-nīti: Dhṛtarāṣṭra and Duryodhana’s Policy Dialogue
राम॑ प्रहरतां श्रेष्ठ दित्सन्तं विविध वसु । अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारा स्वागत है। तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो।” उनके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन-रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा--“महान् व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो”
vaiśampāyana uvāca | rāma praharatāṃ śreṣṭha ditsantaṃ vividhaṃ vasu | ahaṃ dhanam anantaṃ hi prārthaye vipulavrata dvijaśreṣṭha ||
वैशंपायन म्हणाला— “हे राम! शत्रुनाश करणाऱ्यांत श्रेष्ठ, विविध धन देण्याची इच्छा बाळगणाऱ्या! महाव्रती, द्विजश्रेष्ठ! मी तुमच्याकडे असे धन मागतो ज्याला कधी अंत नाही।”
वैशम्पायन उवाच