कृपकृपी-जननम्
The Birth of Kṛpa and Kṛpī; Kṛpa’s Attainment of Astras
पितृदेवर्षिमनुजैददेयं तेभ्यश्व धर्मत: । एतानि तु यथाकालं यो न बुध्यति मानव:,(उन ऋणोंके नाम ये हैं--) पितृ-ऋण, देव-ऋण, ऋषि-ऋण और मनुष्य-ऋण। उन सबका ऋण धर्मतः हमें चुकाना चाहिये। जो मनुष्य यथासमय इन ऋणोंका ध्यान नहीं रखता, उसके लिये पुण्यलोक सुलभ नहीं होते। यह मर्यादा धर्मज्ञ पुरुषोंने स्थापित की है। यज्ञोंद्वारा मनुष्य देवताओंको तृप्त करता है, स्वाध्याय और तपस्याद्वारा मुनियोंको संतोष दिलाता है
Vaiśaṃpāyana uvāca: pitṛ-devarṣi-manujaiḥ dade yaṃ tebhyaś ca dharmataḥ | etāni tu yathākālaṃ yo na budhyati mānavaḥ ||
वैशंपायन म्हणाले— धर्मानुसार पितर, देव, ऋषी आणि मनुष्य—यांना जे देणे आहे ते अवश्य द्यावे. परंतु जो मनुष्य योग्य वेळी ही कर्तव्ये ओळखत नाही, त्याला पुण्यलोक सहज मिळत नाहीत.
वैशम्पायन उवाच