Adhyāya 73: Damayantī’s Investigation of Bāhuka
Keśinī’s Observations
तेनाद्य रथनिर्घोषो नलस्येव महानभूत् । आहोस्विदृतुपर्णोडपि यथा राजा नलस्तथा । यथायं रथनिर्घोषो नैषधस्येव लक्ष्यते,“वह गम्भीर घोष तो महाराज नलके रथ-जैसा था; परंतु इन आगन्तुकोंमें मुझे निषधराज नल नहीं दिखायी देते। वार्ष्पेयने भी नलके समान ही अश्वविद्या सीख ली हो, निश्चय ही यह सम्भावना की जा सकती है। तभी आज रथकी आवाज बड़े जोरसे सुनायी दे रही थी, जैसे नलके रथ हाँकते समय हुआ करती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि राजा ऋतुपर्ण भी वैसे ही अश्वविद्यामें निपुण हों, जैसे राजा नल हैं; क्योंकि नलके ही समान इनके रथका भी गम्भीर घोष लक्षित होता है”
bṛhadaśva uvāca |
tenādya rathanirghoṣo nalasyeva mahān abhūt |
āho svid ṛtuparṇo 'pi yathā rājā nalas tathā |
yathāyaṃ rathanirghoṣo naiṣadhasyeva lakṣyate ||
“അതുകൊണ്ടാണ് ഇന്ന് രഥത്തിന്റെ ഗംഭീര നാദം നളന്റേതുപോലെ മഹത്തായത്. രാജാവ് ഋതുപർണനും രാജാവ് നളനെപ്പോലെ ആയോ? കാരണം ഈ രഥഘോഷം നൈഷധരാജന്റെതുപോലെ തന്നെ തിരിച്ചറിയപ്പെടുന്നു.”
बृहदश्चव उवाच