Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र संक्षेपात् प्रत्रवीमि ते । एतत् पापहरं पुण्यं जन्ममृत्युजरापहम्,दोषोंको निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रतका आचरण करना चाहिये, यह विधाताका बनाया हुआ नियम है। सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है। मनुष्यको उपर्युक्त दोषोंसे रहित और गुणोंसे युक्त होना चाहिये। ऐसे पुरुषका ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है। राजन! तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैंने संक्षेपसे बता दिया। यह तप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके कष्टको दूर करनेवाला, पापहारी तथा परम पवित्र है
sanatsujāta uvāca | yan māṃ pṛcchasi rājendra saṅkṣepāt prabravīmi te | etat pāpaharaṃ puṇyaṃ janma-mṛtyu-jarāpaham ||
രാജേന്ദ്രാ! നീ എന്നോടു ചോദിച്ചതിനെ ഞാൻ സംക്ഷേപമായി പറയുന്നു. ഇത് പുണ്യദായകം, പാപഹരം, ജന്മ-മൃത്യു-ജരാ ദുഃഖങ്ങളെ അകറ്റുന്നതുമാണ്.
सनत्युजात उवाच