Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
क्षमाशील पुरुषोंमें एक ही दोषका आरोप होता है, दूसरेकी तो सम्भावना ही नहीं है। वह दोष यह है कि क्षमाशील मनुष्यको लोग असमर्थ समझ लेते हैं ।। सो<स्य दोषो न मन्तव्य: क्षमा हि परमं बलम् | क्षमा गुणो हाशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा,किंतु क्षमाशील पुरुषका वह दोष नहीं मानना चाहिये; क्योंकि क्षमा बहुत बड़ा बल है। क्षमा असमर्थ मनुष्योंका गुण तथा समर्थोका भूषण है
so 'sya doṣo na mantavyaḥ kṣamā hi paramaṃ balam | kṣamā guṇo hy aśaktānāṃ śaktānāṃ bhūṣaṇaṃ kṣamā ||
വിദുരൻ പറഞ്ഞു—ക്ഷമാശീലന്റെ ആ ‘ദോഷം’ ദോഷമായി കരുതരുത്; കാരണം ക്ഷമ പരമബലമാണ്. അശക്തർക്കു ക്ഷമ ഒരു ഗുണം; ശക്തർക്കു ക്ഷമ തന്നെ ഭൂഷണം—ശക്തിയെ ധർമ്മത്തിൽ നിയന്ത്രിക്കുന്ന മഹത്വം.
विदुर उवाच