Ulūka’s Provocative Envoy-Speech in the Pāṇḍava Camp
Ulūka-dūta-vākya
तथापि निकृतिप्रज्ं पुत्र दुर्दूतदेविनम् । न शवक््नोमि नियमन्तुं वा कर्तु वा हितमात्मन:,“मैं तो समझता हूँ” दैव ही प्रबल है। उसके सामने पुरुषार्थ व्यर्थ है; क्योंकि मैं युद्धके दोषोंको अच्छी तरह जानता हूँ। वे दोष भयंकर संहार उपस्थित करनेवाले हैं, इस बातको भी समझता हूँ, तथापि ठगवि द्याके पण्डित तथा कपटटद्यूत करनेवाले अपने पुत्रको न तो रोक सकता हूँ और न अपना हित-साधन ही कर सकता हूँ
tathāpi nikṛtiprajñaṃ putra durdūtadevinam | na śaknomi niyamantuṃ vā kartuṃ vā hitam ātmanaḥ ||
“എങ്കിലും വഞ്ചനയിൽ പ്രാവീണ്യമുള്ളതും ദുഷ്ട ദ്യൂതത്തിൽ ആസക്തനുമായ എന്റെ പുത്രനെ ഞാൻ നിയന്ത്രിക്കാനാവുന്നില്ല; എന്റെ യഥാർത്ഥ ഹിതവും നേടാനാവുന്നില്ല.”
वैशम्पायन उवाच