Gāndhārī’s Lament and the Identification of Duḥśāsana (स्त्रीपर्व, अध्याय १८)
सहैव सहदेवेन नकुलेनार्जुनेन च । दासीभूतासि पाज्चालि क्षिप्रं प्रविश नो गृहान्,जनार्दन! इसने अपने भाई और कर्णका प्रिय करनेकी इच्छासे सभामें जूएसे जीती गयी द्रौपदीके प्रति कहा था कि 'पांचालि! तू नकुल-सहदेव तथा अर्जुनके साथ ही हमारी दासी हो गयी; अतः शीघ्र ही हमारे घरोंमें प्रवेश कर”
“ഹേ പാഞ്ചാലി! നകുലൻ, സഹദേവൻ, അർജുനൻ എന്നിവരോടൊപ്പം നീയും ഞങ്ങളുടെ ദാസിയായി; അതിനാൽ വേഗം ഞങ്ങളുടെ ഗൃഹങ്ങളിൽ പ്രവേശിക്ക.”
वैशम्पायन उवाच