अध्याय ५७ — राज्ञः नित्यप्रयत्नः, रक्षा-प्रधानता, तथा त्याग-नीतिः
Chapter 57: Constant Royal Vigilance, Primacy of Protection, and Principles of Dismissal
सहायान् सतत कुर्याद् राजा भूतिपुरष्कृत: । तैश्व तुल्यो भवेद् भोगैश्छत्रमात्राज्याधिक:,जो शूरवीर एवं भक्त हों, जिन्हें विपक्षी फोड़ न सकें, जो कुलीन, नीरोग एवं शिष्ट हों तथा शिष्ट पुरुषोंसे सम्बन्ध रखते हों, जो आत्मसम्मानकी रक्षा करते हुए दूसरोंका कभी अपमान न करते हों, धर्मपरायण, विद्वान, लोकव्यवहारके ज्ञाता और शत्रुओंकी गतिविधिपर दृष्टि रखनेवाले हों, जिनमें साधुता भरी हो तथा जो पर्वतोंके समान अटल रहनेवाले हों, ऐसे लोगोंको ही राजा सदा अपना सहायक बनावे और उन्हें ऐश्वर्यका पुरस्कार दे। उन्हें अपने समान ही सुखभोगकी सुविधा प्रदान करे, केवल राजोचित छत्र धारण करना और सबको आज्ञा प्रदान करना--इन दो बातोंमें ही वह उन सहायकोंकी अपेक्षा अधिक रहे
bhīṣma uvāca | sahāyān satataṁ kuryād rājā bhūti-puraḥkṛtaḥ | taiś ca tulyo bhaved bhogaiś chatra-mātrājya-adhikaḥ ||
ഭീഷ്മൻ പറഞ്ഞു—സമൃദ്ധി ആഗ്രഹിക്കുന്ന രാജാവ് എപ്പോഴും യോഗ്യരായ സഹായികളെ നിയോഗിച്ച് ഐശ്വര്യം നൽകി പുരസ്കരിക്കണം. ഭോഗസൗഖ്യങ്ങളിൽ അവരോടു തുല്യനായി നിലകൊള്ളണം; രാജച്ഛത്രധാരണംയും ആജ്ഞാപനാധികാരവും എന്ന രണ്ടിലേ മാത്രം അവരെക്കാൾ മേലായിരിക്കണം.
भीष्म उवाच