जनक–सुलभा संवादः
Janaka–Sulabhā Dialogue on Mokṣa and Non-attachment
कराल मा ते भयमस्तु किज्चि- देतच्छुतं ब्रह्म परं त्वयाद्य । यथादवदुक्त परम पवित्र विशोकमत्यन्तमनादिमध्यम्,कराल! तुमने मुझसे आज परब्रह्मका ज्ञान सुना है; अतः तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये। वह परब्रह्म परम पवित्र, शोकरहित, आदि, मध्य और अनन््तसे शून्य, जन्म-मृत्युसे बचानेवाला, निरामय, निर्भय तथा कल्याणमय है। राजन्! उसका मैंने यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया है। वही सम्पूर्ण ज्ञानोंका तात््विक अर्थ है। ऐसा जानकर उसका ज्ञान प्राप्त करके आज मोहका परित्याग कर दो
karāla mā te bhayam astu kiñcid etac chrutaṃ brahma paraṃ tvayādya | yathāvad uktaṃ parama-pavitraṃ viśokam atyantam anādi-madhyam ||
വസിഷ്ഠൻ പറഞ്ഞു—കരാലാ, നിനക്കു അല്പവും ഭയം ഉണ്ടാകേണ്ട. ഇന്ന് നീ എന്നിൽ നിന്ന് പരബ്രഹ്മജ്ഞാനം ശ്രവിച്ചു. ഞാൻ അതിനെ യഥാവിധി പ്രസ്താവിച്ചു—അത് പരമപവിത്രം, ശോകരഹിതം, ആദി-മധ്യ എന്നീ പരിധികള്ക്കപ്പുറം.
वसिष्ठ उवाच