Adhyātma–Adhibhūta–Adhidaivata Correspondences and the Triguṇa Lakṣaṇas (Śānti-parva 301)
पुत्रदारजलौकीौघं मित्रबान्धवपत्तनम् | अहिंसासत्यमर्यादं प्राणत्यागमहोर्मिणम्,शत्रुसूदन! तदनन्तर वे सिद्ध यति प्रज्ञारूपी नौकाके द्वारा उस संसाररूपी घोर सागरको तर जाते हैं, जिसमें दुःखरूपी जल भरा है। चिन्ता और शोकके बड़े-बड़े कुण्ड हैं। नाना प्रकारके रोग और मृत्यु विशाल ग्राहोंके समान हैं। महान् भय ही महानागोंके समान हैं। तमोगुण कछुए और रजोगुण मछलियाँ हैं। स्नेह ही कीचड़ है। बुढ़ापा ही उससे पार होनेमें कठिनाई है। ज्ञान ही उसका द्वीप है। नाना प्रकारके कर्मोद्वारा वह अगाध बना हुआ है। सत्य ही उसका तीर है। नियम-व्रत आदि स्थिरता है। हिंसा ही उसका शीघ्रगामी महान् वेग है। वह नाना प्रकारके रसोंका भण्डार है। अनेक प्रकारकी प्रीतियाँ ही उस भवसागरके महारत्न हैं। दुःख और संताप ही वहाँकी वायु है। शोक और तृष्णाकी बड़ी-बड़ी भँवरें उठती रहती हैं। तीव्र व्याधियाँ उसके भीतर रहनेवाले महान् जलहस्ती हैं। हड्डियाँ ही उसके घाट हैं। कफ फेन हैं। दान मोतियोंकी राशि हैं। रक्त उसके कुण्डमें रहनेवाले मूँगा हैं। हँसना और चिल्लाना ही उस सागरकी गम्भीर गर्जना है। अनेक प्रकारके अज्ञान ही इसे अत्यन्त दुस्तर बनाये हुए हैं। रोदनजनित आँसू ही उसमें मलिन खारे जलके समान हैं। आसक्तियोंका त्याग ही उसमें परम आश्रय या दूसरा तट है। स्त्री-पुत्र जोंकके समान हैं। मित्र और बन्धु-बान्धव तटवर्ती नगर हैं। अहिंसा और सत्य उसकी सीमा हैं। प्राणोंका परित्याग ही उसकी उत्ताल तरंगें हैं। वेदान्तज्ञान द्वीप है। समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव इसकी जलराशि हैं। मोक्ष उसमें दुर्लभ विषय है और नाना प्रकारके संताप उस संसारसागरके बड़वानल हैं। भरतनन्दन! उससे पार होकर वे आकाशस्वरूप निर्मल परब्रह्ममें प्रवेश कर जाते हैं
bhīṣma uvāca |
putradāra-jalauka-oghāṁ mitra-bāndhava-pattanam |
ahiṁsā-satya-maryādaṁ prāṇa-tyāga-mahormiṇam |
śatru-sūdana ||
ഭീഷ്മൻ പറഞ്ഞു—ശത്രുസൂദനേ! ഈ ഭവസാഗരത്തിൽ പുത്ര‑ദാരങ്ങൾ ജലൗകകളുടെ കൂട്ടംപോലെ ജീവനെ ചേർന്നു പിടിക്കുന്നു; മിത്ര‑ബന്ധുക്കൾ തീരത്തുള്ള പട്ടണങ്ങൾപോലെ നിർത്തി മോഹിപ്പിക്കുന്നു. അഹിംസയും സത്യവും അതിന്റെ മര്യാദ; എന്നാൽ പ്രാണത്യാഗം അതിലെ മഹാതരംഗങ്ങൾ. ഇതറിഞ്ഞ സിദ്ധയതി പ്രബുദ്ധ വിവേകരൂപ നൗകയാൽ അതു കടന്ന്, ആസക്തി ഉപേക്ഷിച്ച്, ശാന്തിയുടെ അപ്പുറത്തീരം പ്രാപിക്കുന്നു.
भीष्म उवाच
Bhishma frames worldly life as an ocean of bondage where even beloved relations can function like ‘leeches’ through attachment. The ethical boundary is ahimsa and satya, and liberation requires discernment and renunciation—crossing beyond clinging to reach peace.
In the Shanti Parva instruction to the post-war king, Bhishma continues a long allegorical description of saṁsāra as a perilous sea. This verse highlights specific features of that sea—family as clinging forces, social ties as shore-towns, and the moral frame of truth and non-violence—within Bhishma’s broader guidance toward liberation.