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Shloka 31

अहिंसा-प्रधान धर्मविचारः

Ahiṃsā as the Superior Dharma: Practical and Scriptural Reasoning

पुरुषेषु स्वरूपेण पुरुषस्त्वं भविष्यसि । स्त्रीषु स्त्रीरूपिणी चैव तृतीयेषु नपुंसकम्‌,“मैं तुम्हें यह दूसरा भी मनोवाजञ्छित वर दे रहा हूँ कि रोगोंसे पीड़ित हुई प्रजा तुम्हारे प्रति दोष-दृष्टि नहीं करेगी। तुम पुरुषोंमें पुरुषरूपसे रहोगी, स्त्रियोंमें स्त्रीरूप धारण कर लोगी और नपुंसकोमें नपुंसक हो जाओगी”

“പുരുഷന്മാരുടെ ഇടയിൽ നീ പുരുഷരൂപത്തിൽ ആയിരിക്കും; സ്ത്രീകളുടെ ഇടയിൽ സ്ത്രീരൂപം ധരിക്കും; തൃതീയരുടെ ഇടയിൽ നപുംസകരൂപം പ്രാപിക്കും.”

पितामह उवाच