Ānṛśaṃsya, Amātya-Guṇa, and Reconciliatory Counsel (आनृशंस्य–अमात्यगुण–संधि-उपदेशः)
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय गुनिका उपदेशविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हआ ॥/ १०५ ॥। अपना छा | अप्--#कू+ - जैसे कुत्ते बहुत जागते हैं, उसी तरह शत्रुकी गतिविधिको देखनेके लिये बराबर जागता रहे। जिस प्रकार हिरन बहुत चौकन्ने होते हैं, जरा भी भयकी आशंका होते ही भाग जाते हैं, उसी तरह हर समय सावधान रहे। भय आनेके पहले ही वहाँसे खिसक जाय। जैसे कौए प्रत्येक मनुष्यकी चेष्टा देखते रहते हैं, किसीको हाथ उठाते देख तुरंत उड़ जाते हैं; इसी प्रकार शत्रुकी चेष्टापर सदा दृष्टि रखे। षर्डाधिकशततमोब< ध्याय: कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना राजोवाच न निकृत्या न दम्भेन ब्रद्मन्निच्छामि जीवितुम् | नाधर्मयुक्तानिच्छेयमर्थान् सुमहतो5प्यहम्,राजाने कहा--ब्रह्मन! मैं कपट और दम्भका आश्रय लेकर जीवित नहीं रहना चाहता। अधर्मके सहयोगसे मुझे बहुत बड़ी सम्पत्ति मिलती हो तो भी मैं उसकी इच्छा नहीं करता
rājovāca | na nikṛtyā na dambhena brāhmann icchāmi jīvitum | nādharmayuktān iccheyam arthān sumahato 'py aham ||
രാജാവ് പറഞ്ഞു— “ഹേ ബ്രാഹ്മണാ! വഞ്ചനയാലോ ദംഭത്താലോ ആശ്രയിച്ച് ഞാൻ ജീവിക്കാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നില്ല. അധർമ്മസഹവാസം മൂലം അത്യന്തം മഹത്തായ ധനം ലഭിച്ചാലും, അത്തരം ലാഭം ഞാൻ ആഗ്രഹിക്കുകയില്ല.”
भीष्म उवाच
A ruler should not preserve life or seek prosperity through deceit, hypocrisy, or any gain tied to adharma; moral integrity is valued above even immense wealth.
Within Bhīṣma’s larger instruction on dharma, a king speaks to a Brāhmaṇa, declaring his refusal to live by trickery or to accept great riches if they require unrighteous means.