(दुर्योधन उवाच अर्जुनेन समो वीर्ये नास्ति लोके धनुर्धर: । योअरर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना ।। दुर्योधन बोला--पिताजी! संसारमें अर्जुनके समान पराक्रमी धनुर्धर दूसरा कोई नहीं है। ये दो बाहुवाले अर्जुन सहस्र भुजाओंवाले कार्तवीर्य अर्जुनके समान शक्तिशाली हैं। शृणु राजन् पुराचिन्त्यानर्जुनस्य च साहसान् । अर्जुनो धन्विनां श्रेष्ठो दुष्कृतं कृतवान् पुरा ।। ट्रुपदस्य पुरे राजन द्रौपद्याश्व स्वयंवरे । महाराज! अर्जुनने पहले जो-जो अचिन्त्य साहसपूर्ण कार्य किये हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनिये। राजन्! पहले राजा ट्रुपदके नगरमें द्रौपदीके स्वयंवरके समय धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने वह पराक्रम कर दिखाया था, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है। स दृष्टवा पार्थिवान् सर्वान् क्रुद्धान् पार्थो महाबल: ।। वारयित्वा शरैस्तीक्ष्णरजयत् तत्र स स्वयम् । जित्वा तु तान् महीपालान् सर्वान् कर्णपुरोगमान् ।। लेभे कृष्णां शुभां पार्थो युद्ध्वा वीर्यबलात् तदा । सर्वक्षत्रसमूहेषु अम्बां भीष्मो यथा पुरा ।। उस समय महाबली अर्जुनने सब राजाओंको कुपित देख तीखे बाणोंके प्रहारसे उन्हें जहाँके तहाँ रोक दिया और स्वयं ही सबपर विजय पायी। कर्ण आदि सभी राजाओंको अपने बल और पराक्रमसे युद्धमें जीतकर कुन्तीकुमार अर्जुनने उस समय शुभलक्षणा द्रौपदीको प्राप्त किया; ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें भीष्मजीने सम्पूर्ण क्षत्रियसमुदायमें अपने बल-पराक्रमसे काशिराजकी कन्या अम्बा आदिको प्राप्त किया था। ततः कदाचिद् बीभत्सुस्तीर्थयात्रां ययौ स्वयम् । अथोलूपीं शुभां जातां नागराजसुतां तदा ।। नागेष्ववाप चाग्रयेषु प्रार्थितोडथ यथातथम् । ततो गोदावरीं वेण्णां कावेरीं चावगाहत । तदनन्तर अर्जुन किसी समय स्वयं तीर्थयात्राके लिये गये। उस यात्रामें ही उन्होंने नागलोकमें पहुँचकर परम सुन्दरी नागराजकन्या उलूपीको उसके प्रार्थना करनेपर विधिपूर्वक पत्नीरूपमें ग्रहण किया। फिर क्रमश: अन्य तीथर्थोमें भ्रमण करते हुए दक्षिणदिशामें जाकर गोदावरी, वेण्णा तथा कावेरी आदि नदियोंमें स्नान किया। स दक्षिणं समुद्रान्तं गत्वा चाप्सरसां च वै कुमारीतीर्थमासाद्य मोक्षयामास चार्जुन: ।। ग्राहरूपान्विता: पजच अतिशौर्येण वै बलात् | दक्षिणसमुद्रके तटपर कुमारीतीर्थमें पहुँचकर अर्जुनने अत्यन्त शौर्यका परिचय देते हुए ग्राहरूपधारिणी पाँच अप्सराओंका बलपूर्वक उद्धार किया। कन्यातीर्थं समभ्येत्य ततो द्वारवतीं ययौ ।। तत्र कृष्णनिदेशात् स सुभद्रां प्राप्प फाल्गुन: । तामारोप्य रथोपस्थे प्रययौ स्वपुरीं प्रति ।। तत्पश्चात् कन्याकुमारीतीर्थकी यात्रा करके वे दक्षिणसे लौट आये और अनेक तीथोमें भ्रमण करते हुए द्वारकापुरी जा पहुँचे। वहाँ भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे अर्जुनने सुभद्राको लेकर रथपर बिठा लिया और अपनी नगरी इन्द्रप्रस्थकी ओर प्रस्थान किया। भूय: शृणु महाराज फाल्गुनस्य तु साहसम् | ददौ च वट्ढेबीभत्सु: प्रार्थितं खाण्डवं वनम् ।। लब्धमात्रे तु तेनाथ भगवान् हव्यवाहन: । भक्षितुं खाण्डवं राज॑स्तत: समुपचक्रमे ।। महाराज! अर्जुनके साहसका और भी वर्णन सुनिये; उन्होंने अग्निदेवको उनके माँगनेपर खाण्डववन समर्पित किया था। राजन! उनके द्वारा उपलब्ध होते ही भगवान् अग्निदेवने उस वनको अपना आहार बनाना आरम्भ किया। ततस्तं भक्षयन्तं वै सव्यसाची विभावसुम् । रथी धन्वी शरान् गृह्य स कलापयुत: प्रभु: ।। पालयामास राजेन्द्र स्ववीर्येण महाबल: ।। राजेन्द्र! जब अग्निदेव खाण्डववनको जलाने लगे, उस समय (अग्निदेवसे) रथ, धनुष, बाण और कवच आदि लेकर महान् बल तथा प्रभावसे युक्त सव्यसाची अर्जुन अपने पराक्रमसे उसकी रक्षा करने लगे। ततः श्रुत्वा महेन्द्रस्तं मेघांस्तान् संदिदेश ह । तेनोक्ता मेघसड्घास्ते ववर्षुरतिवृष्टिभि: ।। खाण्डववनके दाहका समाचार सुनकर देवराज इन्द्रने मेघोंको आग बुझानेकी आज्ञा दी। उनकी प्रेरणासे मेघोंने बड़ी भारी वर्षा प्रारम्भ की। ततो मेघगणान् पार्थ: शरव्रातैः समन््ततः । खगमैववरियामास तदाश्चर्यमिवा भवत् ।। यह देख अर्जुनने आकाशगामी बाणसमूहोंद्वारा सब ओरसे बादलोंको रोक दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई। वारितान् मेघसड्घांश्र श्रुत्वा क्रुद्ध: पुरंदर: । पाण्डरं गजमास्थाय सर्वदेवगणैर्वृत: ।। ययौ पार्थन संयोद्धुं रक्षार्थ खाण्डवस्य च ।। मेघोंको रोका गया सुनकर इन्द्रदेव कुपित हो उठे। श्वेतवर्णवाले ऐरावत हाथीपर आरूढ हो वे समस्त देवताओंके साथ खाण्डववनकी रक्षाके निमित्त अर्जुनसे युद्ध करनेके लिये गये। रुद्राश्न मरुतश्नैव वसवश्चाश्रिनौ तदा । आदित्याश्रैव साध्याश्र विश्वेदेवाश्न भारत ।। गन्धर्वाश्वैव सहिता अन्ये सुरगणाश्च ये । ते सर्वे शस्त्रसम्पन्ना दीप्यमाना: स्वतेजसा । धनंजयं जिधघांसन्त: प्रपेतुर्विबुधाधिपा: ।। भारत! उस समय रुद्र, मरुदगण, वसु, अश्विनीकुमार, आदित्य, साध्यगण, विश्वेदेव, गन्धर्व तथा अन्य देवगण अपने-अपने तेजसे देदीप्यमान एवं अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये गये। वे सभी देवेश्वर अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर टूट पड़े। ततो देवगणा: सर्वे युद्ध्वा पार्थेन वै मुहुः । रणे जेतुमशक्यं तं॑ ज्ञात्वा ते भरतर्षभ ।। शान्तास्ते विबुधा: सर्वे पार्थबाणाभिपीडिता: । भरतश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ बारंबार युद्ध करके जब देवताओंने यह समझ लिया कि इन्हें समरांगणमें पराजित करना असम्भव है, तब वे अर्जुनके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण युद्धसे विरत हो गये (भाग खड़े हुए)। युगान्ते यानि दृश्यन्ते निमित्तानि महान्त्यपि । सर्वाणि तत्र दृश्यन्ते सुघधोराणि महीपते ।। महाराज! प्रलयकालमें जो विनाशसूचक अत्यन्त भयंकर अपशकुन दिखायी देते हैं, वे सभी उस समय प्रत्यक्ष दीखने लगे। ततो देवगणा: सर्वे पार्थ समभिदुद्रुवु: । असम्भ्रान्तस्तु तान् दृष्टवा स तां देवमयीं चमूम् । त्वरित: फाल्गुनो गृह तीक्ष्णांस्तानाशुगांस्तदा ।। शक्रं देवांश्व॒ सम्प्रेक्ष्य तस्थौ काल इवात्यये ।। तदनन्तर सब देवताओंने एक साथ अर्जुनपर धावा किया; परंतु उस देवसेनाको देखकर अर्जुनके मनमें घबराहट नहीं हुई। वे तुरंत ही तीखे बाण हाथमें लेकर इन्द्र और देवताओंकी ओर देखते हुए प्रलयकालमें सर्वसंहारक कालकी भाँति अविचलभावसे खड़े हो गये। ततो देवगणा: सर्वे बीभत्सुं सपुरंदरा: | अवाकिरज्छरव्रातैर्मानुषं तं॑ महीपते ।। राजन! अर्जुनको मानव समझकर इन्द्रसहित सब देवता उनपर बाणसमूहोंकी बौछार करने लगे। ततः पार्थों महातेजा गाण्डीवं गृहा[ सत्वर: ।। वारयामास देवानां शख्रातै: शरांस्तदा । परंतु महातेजस्वी पार्थने शीघ्रतापूर्वक गाण्डीव धनुष लेकर अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे देवताओंके बाणोंको रोक दिया। पुन: क्रुद्धा: सुरा: सर्वे मर्त्य संख्ये महाबला: ।। नानाशस्त्रैर्ववर्षुस्तं सव्यसाचिं महीपते ।। पिताजी! यह देख समस्त महाबली देवता पुनः कुपित हो गये और उस युद्धमें मरणधर्मा अर्जुनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछार करने लगे। तान् पार्थ: शस्त्रवर्षान् वै विसृष्टान् विबुधैस्तदा । द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव निशितै: शरै: ।। अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा देवताओंके छोड़े हुए उन अस्त्र-शस्त्रोंके आकाशमें ही दो-दो तीन-तीन टुकड़े कर दिये। पुनश्च पार्थ: संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुक: । देवसड्घाउछरैस्ती क्ष्णैरार्पयद् वै समन्तत: ।। फिर अधिक क्रोधमें भरकर अर्जुनने अपने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार दिखायी देने लगा और उसके द्वारा सब ओर तीखे सायकोंकी वृष्टि करके सब देवताओंको घायल कर दिया। विद्रुतान् देवसड्घांस्तान् रणे दृष्टवा पुरंदर: । ततः क्रुद्धो महातेजा: पार्थ बाणैरवाकिरत् ।। देवताओंको युद्धसे भागा हुआ देख महातेजस्वी इन्द्रने अत्यन्त कुपित हो पार्थपर बाणोंकी झड़ी लगा दी। पार्थोडपि शक्रं विव्याध मानुषो विबुधाधिपम् ।। ततः सो5श्ममयं वर्ष व्यसृूजद् विबुधाधिप: । तच्छरैरर्जुनो वर्ष प्रतिजघ्ने5त्यमर्षण: ।। अथ संवर्धयामास तद् वर्ष देवराडपि | भूय एव तदा वीर्य जिज्ञासु: सव्यसाचिन: ।। पार्थने मनुष्य होकर भी देवताओंके स्वामी इन्द्रको अपने सायकोंसे बींध डाला। तब देवेश्वरने अर्जुनपर पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ की। यह देख अर्जुन अत्यन्त अमर्षमें भर गये और अपने बाणोंद्वारा उन्होंने इन्द्रकी उस पाषाण-वर्षाका निवारण कर दिया। तदनन्तर देवराज इन्द्रने सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमकी परीक्षा लेनेके लिये पुन: उस पाषाण-वर्षाको पहलेसे भी अधिक बढ़ा दिया। सो<श्मवर्ष महावेगमिषुभि: पाण्डवोडपि च | विलयं गमयामास हर्षयन् पाकशासनम् ।। यह देख पाण्डुनन्दन अर्जुनने इन्द्रका हर्ष बढ़ाते हुए उस अत्यन्त वेगशालिनी पाषाणवर्षाको अपने बाणोंसे विलीन कर दिया। उपादाय तु पाणिभ्यामड्डदं नाम पर्वतम् । सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसु: श्वेतवाहनम् ।। ततोअर्जुनो वेगवद्धिज्वलमानैरजिद्दागै: । बाणैर्विध्वंसयामास गिरिराजं सहस्रश: ।। शक्रं च वारयामास शरै: पार्थो बलाद् युधि । तब इन्द्रने श्वेतवाहन अर्जुनको कुचल डालनेकी इच्छासे वृक्षोंसहित अंगद नामक पर्वत (जो मन्दराचलका एक शिखर है)-को दोनों हाथोंसे उठाकर उनके ऊपर छोड़ दिया। यह देख अर्जुनने अग्निके समान प्रज्वलित और सीधे लक्ष्यतक पहुँचनेवाले सहस्रों वेगशाली बाणोंद्वारा उस पर्वतराजको खण्ड-खण्ड कर दिया। साथ ही पार्थने उस युद्धमें बलपूर्वक बाण मारकर इन्द्रको स्तब्ध कर दिया। तत: शक्रो महाराज रणे वीरं धनंजयम् ।। ज्ञात्वा जेतुमशक्यं तं तेजोबलसमन्वितम् ।। परां प्रीतिं ययौ तत्र पुत्रशौर्येण वासव: । महाराज! तदनन्तर तेज और बलसे सम्पन्न वीर धनंजयको युद्धमें जीतना असम्भव जानकर इन्द्रको अपने पुत्रके पराक्रमसे वहाँ बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। तदा तत्र न तस्यासीद् दिवि कश्चिन्महायशा: ।। समर्थों निर्जये राजन्नपि साक्षात् प्रजापति: ।। राजन्! उस समय वहाँ स्वर्गका कोई भी महायशस्वी वीर, चाहे साक्षात् प्रजापति ही क्यों न हों, ऐसा नहीं था, जो अर्जुनको जीतनेमें समर्थ हो सके। ततः पार्थ: शरै्हत्वा यक्षराक्षसपन्नगान् | दीप्ते चाग्नी महातेजा: पातयामास संततम् ।। प्रतिप्रेक्षयितुं पार्थ न शेकुस्तत्र केचन । दृष्टवा निवारितं शक्रं दिवि देवगणै: सह ।। तदनन्तर महातेजस्वी अर्जुन अपने बाणोंसे यक्ष, राक्षमस और नागोंको मारकर उन्हें लगातार प्रज्वलित अग्निमें गिराने लगे। स्वर्गवासी देवताओंसहित इन्द्रको अर्जुनने युद्धसे विरत कर दिया, यह देख उस समय कोई भी उनकी ओर दृष्टिपात नहीं कर पाते थे। यथा सुपर्ण: सोमार्थ विबुधानजयत् पुरा । तथा जित्वा सुरान् पार्थस्तर्पपामास पावकम् ।। ततोडर्जुन: स्ववीर्येण तर्पयित्वा विभावसुम् । रथं ध्वजं हयांश्रैव दिव्यास्त्राणि सभां च वै ।। गाण्डीवं च धनु:श्रेष्ठ तूणी चाक्षयसायकौ । एतान्यवाप बीभत्सुलेंभे कीर्ति च भारत ।। भारत! जैसे पूर्वकालमें गरुड़ने अमृतके लिये देवताओंको जीत लिया था, उसी प्रकार कुन्तीपुत्र अर्जुनने भी देवताओंको जीतकर खाण्डववनके द्वारा अग्निदेवको तृप्त किया। इस प्रकार पार्थने अपने पराक्रमसे अग्निदेवको तृप्त करके उनसे रथ, ध्वजा, अश्व, दिव्यास्त्र, उत्तम धनुष गाण्डीव तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तूणीर प्राप्त किये। इनके सिवा अनुपम यश और मयासुरसे एक सभाभवन भी उन्हें प्राप्त हुआ। भूयोडपि शृणु राजेन्द्र पार्थो गत्वोत्तरां दिशम् । विजित्य नववर्षाश्व सपुरांश्च॒ सपर्वतान् ।। जम्बूद्वीपं वशे कृत्वा सर्व तद् भरतर्षभ । बलाज्जित्वा नृपान् सर्वान् करे च विनिवेश्य च ।। रत्नान्यादाय सर्वाणि गत्वा चैव पुनः पुरीम् ततो ज्येष्ठं महात्मानं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।। राजसू[यं क्रतुश्रेष्ठ कारयामास भारत ।। राजेन्द्र! अर्जुनके पराक्रमकी कथा अभी और सुनिये। उन्होंने उत्तरदिशामें जाकर नगरों और पर्वतोंसहित जम्बूद्वीपके नौ वर्षोपर विजय पायी। भरतश्रेष्ठ! उन्होंने समस्त जम्बूद्वीपको वशमें करके सब राजाओंको बलपूर्वक जीत लिया और सबपर कर लगाकर उनसे सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट ले वे पुन: अपनी पुरीको लौट आये। भारत! तदनन्तर अर्जुनने अपने बड़े भाई महात्मा धर्मराज युधिष्ठिरसे क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करवाया। स तान्यन्यानि कर्माणि कृतवानर्जुन: पुरा | अर्जुनेन समो वीर्ये नास्ति लोके पुमान् क्वचित् ।। पिताजी! इस प्रकार अर्जुनने पूर्वकालमें ये तथा और भी बहुत-से पराक्रम कर दिखाये हैं। संसारमें कहीं कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो बल और पराक्रममें अर्जुनकी समानता कर सके। देवदानवयक्षाश्ष पिशाचोरगराक्षसा: । भीष्मद्रोणादय: सर्वे कुरवश्च महारथा: ।। लोके सर्वनृपाश्चैव वीराश्चान्ये धनुर्धरा: । एते चान्ये च बहव: परिवार्य महीपते ।। एकं पार्थ रणे यत्ता: प्रतियोद्धुं न शक्नुयु: ।। देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग, राक्षस एवं भीष्म, द्रोण आदि समस्त कौरव महारथी, भूमण्डलके सम्पूर्ण नरेश तथा अन्य धनुर्धर वीर--ये तथा अन्य बहुत-से शूरवीर युद्धभूमिमें अकेले अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर पूरी सावधानीके साथ खड़े हो जायेँ तो भी उनका सामना नहीं कर सकते। अहं हि नित्यं कौरव्य फाल्गुनं प्रति सत्तमम् । अनिशं चिन्तयित्वा त॑ समुद्विग्नोडस्मि तद्भयात् ।। कुरुश्रेष्ठ! मैं साधुशिरोमणि अर्जुनके विषयमें नित्य-निरन्तर चिन्तन करते हुए उनके भयसे अत्यन्त उद्विग्न हो जाता हूँ। गृहे गृहे च पश्यामि तात पार्थमहं सदा । शरगाण्डीवसंयुक्तं पाशहस्तमिवान्तकम् ।। अपि पार्थसहस्राणि भीत: पश्यामि भारत । पार्थभूतमिदं सर्व नगरं प्रतिभाति मे ।। पिताजी! मुझे प्रत्येक घरमें सदा हाथमें पाश लिये यमराजकी भाँति गाण्डीव धनुषपर बाण चढ़ाये अर्जुन दिखायी देते हैं। भारत! मैं इतना डर गया हूँ कि मुझे सहस्रों अर्जुन दृष्टिगोचर होते हैं। यह सारा नगर मुझे अर्जुनरूप ही प्रतीत होता है। पार्थमेव हि पश्यामि रहिते तात भारत । दृष्टवा स्वप्नगतं पार्थमुद्भ्रमामि हृचेतन: ।। भारत! मैं एकान्तमें अर्जुनको ही देखता हूँ। स्वप्चमें भी अर्जुनको देखकर मैं अचेत और उदशभ्रान्त हो उठता हूँ। अकारादीनि नामानि अर्जुनत्रस्तचेतस: । अश्रवश्षार्था हाजाश्रैव त्रासं संजनयन्ति मे ।। मेरा हृदय अर्जुनसे इतना भयभीत हो गया है कि अश्व, अर्थ और अज आदि अकारादि नाम मेरे मनमें त्रास उत्पन्न कर देते हैं। नास्ति पार्थादृते तात परवीरादू भयं मम । प्रह्नादं वा बलिं वापि हन्याद्धि विजयो रणे ।। तस्मात् तेन महाराज युद्धमस्मज्जनक्षयम् | अहं तस्य प्रभावज्ञो नित्यं दुःखं वहामि च ।। तात! अर्जुनके सिवा शत्रुपक्षके दूसरे किसी वीरसे मुझे डर नहीं लगता है। महाराज! मेरा विश्वास है कि अर्जुन युद्धमें प्रह्नमाद अथवा बलिको भी मार सकते हैं; अत: उनके साथ किया हुआ युद्ध हमारे सैनिकोंके ही संहारका कारण होगा। मैं अर्जुनके प्रभावको जानता हूँ। इसीलिये सदा दुःखके भारसे दबा रहता हूँ। पुरा हि दण्डकारण्ये मारीचस्य यथा भयम् | भवेद् रामे महावीर्ये तथा पार्थे भयं मम ।। जैसे पूर्वकालमें दण्डकारण्यवासी महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीसे मारीचको भय हो गया था, उसी प्रकार अर्जुनसे मुझे भय हो रहा है। धृतराष्ट उवाच जानाम्येव महद् वीर्य जिष्णोरेतद् दुरासदम् | तात वीरस्य पार्थस्य मा कार्षीस्त्वं तु विप्रियम् ।। द्यूतं वा शस्त्रयुद्ध वा दुर्वाक्यं वा कदाचन । एतेष्वेवं कृते तस्य विग्रहश्चैव वो भवेत् ।। तस्मात् त्वं पुत्र पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ।। यश्न पार्थेन सम्बन्धाद् वर्तते च नरो भुवि । तस्य नास्ति भयं किंचित् त्रिषु लोकेषु भारत ।। तस्मात् त्वं जिष्णुना वत्स नित्यं स्नेहेन वर्तय ।। धृतराष्ट्र बोले--बेटा! अर्जुनके महान् पराक्रमको तो मैं जानता ही हूँ। उनके इस पराक्रमका सामना करना अत्यन्त कठिन है। अत: तुम वीर अर्जुनका कोई अपराध न करो। उनके साथ द्यूतक्रीड़ा, शस्त्रयुद्ध अथवा कटु वचनका प्रयोग कभी न करो; क्योंकि इन्हींके कारण उनका तुमलोगोंके साथ विवाद हो सकता है। अतः बेटा! तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो। भारत! जो मनुष्य इस पृथ्वीपर अर्जुनके साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रखते हुए उनसे सद्व्यवहार करता है, उसे तीनों लोकोंमें तनिक भी भय नहीं है; अतः वत्स! तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो। दुर्योधन उवाच द्यूते पार्थस्य कौरव्य मायया निकृति: कृता । तस्माद्धि तं जहि सदा त्वन्योपायेन नो भवेत् ।। दुर्योधन बोला--कुरुश्रेष्ठ! जूएमें हमलोगोंने अर्जुनके प्रति छल-कपटका बर्ताव किया था, अतः आप किसी दूसरे उपायसे उन्हें मार डालें। इसीसे हमलोगोंका सदा भला होगा। धृतराष्ट्र रवाच उपायश्च न कर्तव्य: पाण्डवान् प्रति भारत । पार्थान् प्रति पुरा वत्स बहूपाया: कृतास्त्वया ।। तानुपायान् हि कौन्तेया बहुशो व्यतिचक्रमु: ।। तस्माद्धितं जीविताय न: कुलस्य जनस्य च । त्वं चिकीर्षसि चेद् वत्स समित्र: सहबान्धव: । सभ्रातृकस्त्व॑ं पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ।। धृतराष्ट्रने कहा--भारत! पाण्डवोंके प्रति किसी अनुचित उपायका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बेटा! तुमने उन सबको मारनेके लिये पहले बहुत-से उपाय किये हैं। कुन्तीके पुत्र तुम्हारे उन सभी प्रयत्नोंका उल्लंघन करके बहुत बार आगे बढ़ गये हैं; अतः वत्स! यदि तुम अपने कुल और आत्मीयजनोंकी जीवनरक्षाके लिये किसी हितकर उपायका अवलम्बन करना चाहते हो तो मित्र, बन्धु-बान्धव तथा भाइयोंसहित तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो। वैशम्पायन उवाच धृतराष्ट्रवच: श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । चिन्तयित्वा मुहूर्त तु विधिना चोदितो<ब्रवीत् ।॥।) वैशम्पायनजी कहते हैं--धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधन दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करके विधातासे प्रेरित हो इस प्रकार बोला। दुर्योधन उवाच न त्वयेदं श्रुत राजन् यज्जगाद बृहस्पति: । शक्रस्य नीतिं प्रवदन् विद्वान् देवपुरोहित:,दुर्योधन बोला--राजन्! देवगुरु विद्वान् बृहस्पतिजीने इन्द्रको नीतिका उपदेश करते हुए जो बात कही है, उसे शायद आपने नहीं सुना है
duryodhana uvāca | arjunena samo vīrye nāsti loke dhanurdharaḥ | yo 'rjunenārjunas tulyo dvibāhur bahubāhunā ||
ദുര്യോധനൻ പറഞ്ഞു—പിതാവേ! ലോകത്തിൽ അർജുനനോടു തുല്യമായ വീര്യമുള്ള ധനുർധരൻ മറ്റാരുമില്ല. ഈ ദ്വിബാഹു അർജുനൻ ബഹുബാഹുവായ കാർത്തവീര്യ അർജുനനോടു സമൻ.
दुर्योधन उवाच
Recognizing another’s excellence is ethically fruitful only when joined with restraint and goodwill. Duryodhana’s acknowledgment, driven by fear and rivalry, illustrates how admiration without humility can become the seed of adharma—pushing one toward hostility rather than reconciliation.
In the Sabha Parva dialogue with his father Dhṛtarāṣṭra, Duryodhana emphasizes Arjuna’s unsurpassed martial prowess, even likening him to the legendary Kārtavīrya Arjuna. This sets the tone for Duryodhana’s growing anxiety about the Pāṇḍavas and his inclination toward harmful counsels.