Sabhā Parva, Adhyāya 68 — Pāṇḍavānāṃ Vanavāsa-prasthānaḥ; Duḥśāsana-nindā; Pāṇḍava-pratijñāḥ
वैशम्पायन उवाच आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्याश्चिन्तितो हरि: । वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! जब वस्त्र खींचा जाने लगा, तब द्रौपदीने भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण किया ।। (्रौपह्ुुवाच ज्ञातं मया वसिष्ठेन पुरा गीत॑ महात्मना । महत्यापदि सम्प्राप्ते स्मर्तव्यो भगवान् हरि: ।। द्रौपदीने मन-ही-मन कहा--मैंने पूर्वकालमें महात्मा वसिष्ठजीकी बतायी हुई इस बातको अच्छी तरह समझा है कि भारी विपत्ति पड़नेपर भगवान् श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। वैशम्पायन उवाच गोविन्देति समाभाष्य कृष्णेति च पुन: पुनः । मनसा चिन्तयामास देवं नारायण प्रभुम् ।। आपत्स्वभयदं कृष्णं लोकानां प्रपितामहम् ।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा विचारकर द्रौपदीने बारंबार “गोविन्द” और “कृष्ण” का नाम लेकर पुकारा और आपत्तिकालमें अभय देनेवाले लोकप्रपितामह नारायण-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका मन-ही-मन चिन्तन किया। गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय,'हे गोविन्द! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण! हे गोपांगनाओंके प्राणवललभ केशव! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, क्या आप नहीं जानते? हे नाथ! हे रमानाथ! हे व्रजनाथ! हे संकटनाशन जानार्दन! मैं कौरवरूप समुद्रमें डूबी जा रही हूँ, मेरा उद्धार कीजिये
vaiśampāyana uvāca |
ākṛṣyamāṇe vasane draupadyāś cintito hariḥ |
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ദ്രൗപദിയുടെ വസ്ത്രം വലിച്ചിഴക്കപ്പെടുമ്പോൾ അവൾ മനസ്സിൽ ഹരിയെ (ശ്രീകൃഷ്ണനെ) സ്മരിച്ചു.
वैशम्पायन उवाच
When all worldly supports fail, one should not abandon dharma; instead, one should take refuge in the Divine. Draupadī’s remembrance of Hari models inner surrender and moral clarity amid injustice.
During the Kaurava attempt to strip Draupadī in the royal assembly, her garment is being pulled. At that moment she mentally calls upon Hari (Kṛṣṇa), setting the stage for divine protection and the exposure of adharma in the court.