Samrāt-Lakṣaṇa and the Counsel to Check Jarāsandha (सम्राट्-लक्षणं जरासन्ध-प्रतिबाधा-परामर्शः)
तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भयार्दिता: । मत्स्या: संन्यस्तपादाश्न दक्षिणां दिशमाश्रिता:,शूरसेन, भद्रकार, बोध, शाल्व, पटच्चर, सुस्थल, सुकुट्ट, कुलिन्द, कुन्ति तथा शाल्वायन आदि राजा भी अपने भाइयों तथा सेवकोंके साथ दक्षिण दिशामें भाग गये हैं। जो लोग दक्षिण पंचाल एवं पूर्वी कुन्तिप्रदेशमें रहते थे, वे सभी क्षत्रिय तथा कोशल, मत्स्य, संन्यस्तपाद आदि राजपूत भी जरासंधके भयसे पीड़ित हो उत्तर दिशाको छोड़कर दक्षिण दिशाका ही आश्रय ले चुके हैं
tathottarāṃ diśaṃ cāpi parityajya bhayārditāḥ | matsyāḥ saṃnyastapādāś ca dakṣiṇāṃ diśam āśritāḥ ||
അതുപോലെ ഭയാർത്തരായി അവർ വടക്കുദിക്കെയും ഉപേക്ഷിച്ചു. മത്സ്യരും സന്ന്യാസ്തപാദരും തെക്കുദിക്കിൽ അഭയം തേടി—ഭയത്താൽ തള്ളപ്പെട്ട്—പലയിടത്തും ഓടിപ്പോയി.
श्रीकृष्ण उवाच