प्रविद्धघण्टाड्कुशतोमरध्वजै: सहेमजालै रुधिरौघसम्प्लुतै: । शरावभिशन्नैः पतितैस्तुरड़मै: श्वुसद्धिरातेैं: क्षतजं वमद्धि:,शल्य बोले--वीर नरेश! देखो, मारे गये मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशोंसे भरा हुआ यही युद्धस्थल कैसा भयंकर जान पड़ता है? पर्वताकार गजराज, जिनके मस्तकोंसे मदकी धारा फूटकर बहती थी, एक ही साथ बाणोंकी मारसे शरीर विदीर्ण हो जानेके कारण धराशायी हो गये हैं। उनमेंसे कितने ही वेदनासे छटपटा रहे हैं, कितनोंके प्राण निकल गये हैं। उनपर बैठे हुए सवारोंके कवच, अस्त्र-शस्त्र, ढाल और तलवार आदि नष्ट हो गये हैं। इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो वज़के आघातसे बड़े-बड़े पर्वत ढह गये हों और उनके प्रस्तरखण्ड, विशाल वृक्ष तथा औषधसमूह छिलन्न-भिन्न हो गये हों। उन गजराजोंके घंटा, अंकुश, तोमर और ध्वज आदि सभी वस्तुएँ बाणोंके आघातसे टूट- फ़ूटकर बिखर गयी हैं। उन हाथियोंके ऊपर सोनेकी जालीसे युक्त आवरण पड़ा है। उनकी लाशें रक्तके प्रवाहसे नहा गयी हैं। घोड़े बाणोंसे विदीर्ण होकर गिरे हैं, वेदनासे व्यथित हो उच्छवास लेते और मुखसे रक्त वमन करते हैं। वे दीनतापूर्ण आर्तनाद कर रहे हैं। उनकी आँखें घूम रही हैं। वे धरतीमें दाँत गड़ाते और करुण चीत्कार करते हैं। हाथी, घोड़े, पैदल सैनिक तथा वीरसमुदाय बाणोंसे क्षत-विक्षत हो मरे पड़े हैं। किन्हींकी साँसें कुछ-कुछ चल रही हैं और कुछ लोगोंके प्राण सर्वथा निकल गये हैं। हाथी, घोड़े, मनुष्य और रथ कुचल दिये गये हैं। इन सबकी कान्ति मन्द पड़ गयी है। इनके कारण उस महासमरकी भूमि निश्चय ही वैतरणीके समान प्रतीत होती है
śalya uvāca | praviddha-ghaṇṭāṅkuśa-tomara-dhvajaiḥ sa-hema-jālaiḥ rudhiraugha-samplutaiḥ | śarāvabhiśchinnaiḥ patitais turaṅgamaiḥ śvasadbhir ārtaiḥ kṣatajaṃ vamadbhīḥ ||
ശല്യൻ പറഞ്ഞു—മണികൾ, അങ്കുശങ്ങൾ, തോമരങ്ങൾ, ധ്വജങ്ങൾ അമ്പുകളുടെ പ്രഹരത്തിൽ തകർന്നു ചിതറിക്കിടക്കുന്നു; സ്വർണ്ണജാലം ചേർത്ത ആവരണങ്ങൾ രക്തപ്രവാഹത്തിൽ നനഞ്ഞിരിക്കുന്നു. അമ്പുകളാൽ കീറിപ്പിളർന്ന കുതിരകൾ വേദനയിൽ ശ്വാസംമുട്ടി, രക്തം ഛർദ്ദിച്ചുകൊണ്ട് വീണുകിടക്കുന്നു।
शल्य उवाच
The verse underscores the ethical gravity and human cost of war: even ‘heroic’ battle culminates in suffering, broken bodies, and the collapse of worldly splendor. By likening the field to Vaitaraṇī, it warns that violence turns the arena of glory into a landscape of death, inviting reflection on dharma and restraint.
Śalya describes to a king/warrior the horrific state of the battlefield: elephants and horses lie cut down by arrows, equipment is shattered, blood flows in torrents, and some creatures still gasp and writhe. The scene is painted through powerful similes (mountains shattered by a thunderbolt) to convey the scale of destruction.