Karṇa-parva Adhyāya 58 — Arjuna’s Arrow-Storm and Relief of Bhīmasena
रथमारुरुहे वीरो धनंजयशरार्दित: । प्रगृह्य च धनु: श्रेष्ठ पार्थ विव्याध सायकै:,राजन्! उन भयंकर बाणोंसे घायल हुआ प्रतापी वीर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा समरांगणमें अमित बलशाली धृष्टद्यम्मको छोड़कर अपने रथपर जा चढ़ा। वह धनंजयके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो चुका था; इसलिये उसने भी श्रेष्ठ धनुष हाथमें लेकर बाणोंद्वारा अर्जुनको घायल कर दिया
ratham ārurohe vīro dhanañjaya-śarārditaḥ | pragṛhya ca dhanuḥ śreṣṭhaṃ pārtho vivyādha sāyakaiḥ, rājan |
ധനഞ്ജയന്റെ ശരങ്ങളാൽ ആർത്തനായ ആ വീരൻ വീണ്ടും രഥത്തിൽ കയറി; ശ്രേഷ്ഠധനുസ്സു കൈക്കൊണ്ട് ശരങ്ങളാൽ പാർത്ഥനെ (അർജുനനെ) വേധിച്ചു।
संजय उवाच