Puruṣottama-yoga
The Discipline of the Supreme Person) — Chapter 15 (Bhagavadgītā
सम्बन्ध--इस प्रकार तीन श्लोकोंमें बार-बार अपना अद्भुत रूप देखनेके लिये आज्ञा देनेपर भी जब अर्जुन भगवान्के रूपको नहीं देख सके; तब उसके न देख सकनेके कारणको जाननेवाले अन्तयमी भगवान् अजुनिको दिव्य दृष्टि देनेकी इच्छा करके कहने लगे-- नतु मां शक््यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम्,परंतु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रोंद्वारा देखनेमें नि:संदेह समर्थ नहीं है; इसीसे मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ, उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्तिको देख
arjuna uvāca | na tu māṁ śakyase draṣṭum anenaiva svacakṣuṣā | divyaṁ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogam aiśvaram ||
എന്നാൽ ഈ സാധാരണ കണ്ണുകളാൽ നീ എന്നെ കാണാൻ കഴിയില്ല. അതിനാൽ ഞാൻ നിനക്ക് ദിവ്യദൃഷ്ടി നൽകുന്നു; അതിലൂടെ എന്റെ ഐശ്വര്യയോഗശക്തി കാണുക.
अजुन उवाच