धृतराष्ट्रस्य स्पर्शाभिलाषः — Dhṛtarāṣṭra’s Request for Touch and Permission for Tapas
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्रमवासिकपवके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्रका उपदेशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,उत्साहप्रभुशक्तिभ्यां मन्त्रशक्त्या च भारत । उपपन्नो नृपो यायाद् विपरीतं च वर्जयेत् भारत! जो राजा उत्साह-शक्ति, प्रभु-शक्ति और मन्त्र-शक्तिमें शत्रुकी अपेक्षा बढ़ा-चढ़ा हो, उसे ही आक्रमण करना चाहिये। यदि इसके विपरीत अवस्था हो तो आक्रमणका विचार त्याग देना चाहिये
utsāha-prabhu-śaktibhyāṁ mantra-śaktyā ca bhārata | upapanno nṛpo yāyād viparītaṁ ca varjayet ||
ഹേ ഭാരത! ഉത്സാഹശക്തി, പ്രഭുശക്തി, മന്ത്രശക്തി—ഈ മൂന്നിലും ശത്രുവിനെക്കാൾ മേലുള്ള രാജാവേ ആക്രമണം നടത്തണം; അവസ്ഥ മറിച്ചായാൽ ആക്രമണചിന്ത തന്നെ ഉപേക്ഷിക്കണം।
धघतयाट्र उवाच