Vyāsa’s Inquiry into Dhṛtarāṣṭra’s Tapas and the Identification of Vidura with Dharma
गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत् पूजिता वयम् । राजा यदाह तत् कार्य त्वया पुत्र पितुर्वच:,यह सुनकर गान्धारीने कहा--“बेटा! ऐसी बात न कहो। मैं जो कहती हूँ उसे सुनो। यह सारा कुरुकुल तुम्हारे ही अधीन है। मेरे श्वशुरका पिण्ड भी तुमपर ही अवलम्बित है; अतः पुत्र! तुम जाओ, तुमने हमारे लिये जितना किया है, वही बहुत है। तुम्हारे द्वारा हमलोगोंका स्वागत-सत्कार भलीभाँति हो चुका है। इस समय महाराज जो जअज्ञा दे रहे हैं, वही करो; क्योंकि पिताका वचन मानना तुम्हारा कर्तव्य है”
vaiśampāyana uvāca |
gamyatāṃ putra paryāptam etāvat pūjitā vayam |
rājā yad āha tat kāryaṃ tvayā putra pitur vacaḥ ||
“മകനേ, ഇനി നീ പോകുക; ഇത്രയുമതി. ഞങ്ങൾ യഥാവിധി ആദരിക്കപ്പെട്ടിരിക്കുന്നു. രാജാവ് പറയുന്നതു തന്നെയാകട്ടെ നീ ചെയ്യുക, മകനേ; പിതാവിന്റെ വചനം അനുസരിക്കുന്നതുതന്നെ നിന്റെ ധർമ്മം.”
वैशम्पायन उवाच