अनुशासनपर्व अध्याय ९३ — तपस्, सदोपवास, विघसाशन, अतिथिप्रियता
Austerity, regulated fasting, residual-eating, and hospitality
अग्रया: सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च । यावदेते प्रपश्यन्ति पंक्त्यास्तावत्पुनन्त्युत,जो मोक्ष-धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्तिको जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं
agrayāḥ sarveṣu vedeṣu sarvapravacaneṣu ca | yāvad ete prapaśyanti paṅktyās tāvat punanty uta ||
ഭീഷ്മൻ പറഞ്ഞു—സകല വേദങ്ങളിലും സകല പ്രവചനങ്ങളിലും അഗ്രഗണ്യരായ അത്തരം ബ്രാഹ്മണർ പംക്തിയിൽ എത്ര ദൂരത്തേക്ക് ദൃഷ്ടി വീശുന്നുവോ, അത്ര ദൂരത്തോളം ഇരിക്കുന്നവരെല്ലാം അവർ പവിത്രമാക്കുന്നു.
भीष्म उवाच