Shloka 33

पुण्य: सोमगिरिश्वैव तथैवान्ये महीधरा: । दिशश्न विदिशश्रैव क्षिति: सर्वे महीरुहा:,(देवता और ऋषि आदिके वंशकी नामावली इस प्रकार है--) सर्वभूतनमस्कृत, देवासुरगुरु, अचिन्त्य, अनिर्देश्य सबके प्राणस्वरूप और अयोनिज (स्वयम्भू) जगदीश्वर पितामह भगवान्‌ ब्रह्माजी, उनकी पत्नी सती सावित्री देवी, वेदोंके उत्पत्तिस्थान जगत्कर्ता भगवान्‌ नारायण, तीन नेत्रोंवाले उमापति महादेव, देवसेनापति स्कन्द, विशाख, अग्नि, वायु, प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य, शचीपति इन्द्र, यमराज, उनकी पत्नी धूमोर्णा, अपनी पत्नी गौरीके साथ वरुण, ऋद्धिसहित कुबेर, सौम्य स्वभाववाली देवी सुरभी गौ, महर्षि विश्रवा, संकल्प, सागर, गंगा आदि नदियाँ, मरुठ्रण, तपः:सिद्ध वालखिल्य ऋषि, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, तुम्बुरु, चित्रसेन, विख्यात देवदूत, महासौभाग्यशालिनी देवकन्याएँ, दिव्य अप्सराओंके समुदाय, उर्वशी, मेनका, रम्भा, मिश्रकेशी, अल्म्बुषा, विश्वाची, घृताची, पंचचूडा और तिलोत्तमा आदि दिव्य अप्सराएँ, बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, अश्विनीकुमार, पितर, धर्म, शास्त्रज्ञान, तपस्या, दीक्षा, व्यवसाय, पितामह, रात, दिन, मरीचिनन्दन कश्यप, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, बुध, राहु, शनैश्वर, नक्षत्र, ऋतु, मास, पक्ष, संवत्सर, विनताके पुत्र गरुड़, समुद्र, कद्रूके पुत्र सर्पगण, शतद्गु, विपाशा, चन्द्रभागा, सरस्वती, सिन्धु, देविका, प्रभास, पुष्कर, गंगा, महानदी, वेणा, कावेरी, नर्मदा, कुलम्पुना, विशल्या, करतोया, अम्बुवाहिनी, सरयू, गण्डकी, लाल जलवाला महानद शोणभद्र, ताम्रा, अरुणा, वेत्रवती, पर्णाशा, गौतमी, गोदावरी, वेण्या, कृष्णवेणा, अद्रिजा, दृषद्वती, कावेरी, चक्षु, मन्दाकिनी, प्रयाग, प्रभास, पुण्यमय नैमिषारण्य, जहाँ विश्वेश्वरका स्थान है वह विमल सरोवर, स्वच्छ सलिलसे युक्त पुण्यतीर्थ कुरुक्षेत्र, उत्तम समुद्र, तपस्या, दान, जम्बूमार्ग, हिरण्वती, वितस्ता, प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति वेदवती, मालवा, अश्ववती, पवित्र भूभाग, गंगाद्वार (हरिद्वार), ऋषिकुल्या, समुद्रगामिनी पवित्र नदियाँ, पुण्यसलिला चर्मण्वती नदी, कौशिकी, यमुना, भीमरथी, महानदी बाहुदा, माहेन्द्रवाणी, त्रिदिवा, नीलिका, सरस्वती, नन्‍्दा, अपरनन्दा, तीर्थभूत महान्‌ हृद, गया, फल्गुतीर्थ, देवताओंसे युक्त धर्मारण्य, पवित्र देवनदी, तीनों लोकोंमें विख्यात, पवित्र एवं सर्वपापनाशक कल्याणमय ब्रह्मनिर्मित सरोवर (पुष्करतीर्थ)) दिव्य ओषधियोंसे युक्त हिमवान्‌ पर्वत, नाना प्रकारके धातुओं, तीर्थों, औषधोंसे सुशोभित विन्ध्यगिरि, मेरु, महेन्द्र, मलय, चाँदीकी खानोंसे युक्त श्वेतगिरि, शृंगवान्‌, मन्दर, नील, निषध, दर्दुर, चित्रकूट, अजनाभ, गन्धमादन पर्वत, पवित्र सोमगिरि तथा अन्यान्य पर्वत, दिशा, विदिशा, भूमि, सभी वृक्ष, विश्वेदेव, आकाश, नक्षत्र और ग्रहगण--ये सदा हमारी रक्षा करें तथा जिनके नाम लिये गये हैं और जिनके नहीं लिये गये हैं, वे सम्पूर्ण देवता हमलोगोंकी रक्षा करते रहें

puṇyaḥ somagiriś caiva tathaivānye mahīdharāḥ | diśaś ca vidiśaś caiva kṣitiḥ sarve mahīruhāḥ ||

ഭീഷ്മൻ പറഞ്ഞു— “പുണ്യമായ സോമഗിരിയും മറ്റ് എല്ലാ പർവ്വതങ്ങളും; ദിക്കുകളും ഉപദിക്കുകളും; ഭൂമിയും അവളിൽ വളരുന്ന എല്ലാ വൃക്ഷങ്ങളും—ഇവയെല്ലാം എപ്പോഴും ഞങ്ങളെ കാത്തുരക്ഷിക്കട്ടെ.”

पुण्यःholy, meritorious
पुण्यः:
Karta
TypeAdjective
Rootपुण्य
FormMasculine, Nominative, Singular
सोमगिरिःthe Soma-mountain (Somagiri)
सोमगिरिः:
Karta
TypeNoun
Rootसोमगिरि
FormMasculine, Nominative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
एवindeed, also
एव:
TypeIndeclinable
Rootएव
तथाthus, likewise
तथा:
TypeIndeclinable
Rootतथा
एवindeed, also
एव:
TypeIndeclinable
Rootएव
अन्येother
अन्ये:
Karta
TypeAdjective
Rootअन्य
FormMasculine, Nominative, Plural
महीधराःmountains (earth-bearers)
महीधराः:
Karta
TypeNoun
Rootमहीधर
FormMasculine, Nominative, Plural
दिशःdirections
दिशः:
Karta
TypeNoun
Rootदिश्
FormFeminine, Nominative, Plural
and
:
TypeIndeclinable
Root
विदिशःintermediate directions (sub-directions)
विदिशः:
Karta
TypeNoun
Rootविदिश्
FormFeminine, Nominative, Plural
and
:
TypeIndeclinable
Root
एवindeed, also
एव:
TypeIndeclinable
Rootएव
क्षितिःearth, ground
क्षितिः:
Karta
TypeNoun
Rootक्षिति
FormFeminine, Nominative, Singular
सर्वेall
सर्वे:
Karta
TypeAdjective
Rootसर्व
FormMasculine, Nominative, Plural
महीरुहाःtrees (earth-growing ones)
महीरुहाः:
Karta
TypeNoun
Rootमहीरुह
FormMasculine, Nominative, Plural

भीष्म उवाच

B
Bhīṣma
S
Somagiri
O
other mountains (mahīdharāḥ)
T
the directions (diśaḥ)
T
the intermediate directions (vidiśaḥ)
T
the earth (kṣitiḥ)
T
trees (mahīruhāḥ)

Educational Q&A

Protection and well-being are sought by remembering and honoring the sustaining powers of the world—sacred mountains, the ordered directions, the earth, and life-giving trees—reflecting a dharmic attitude of reverence toward the cosmos rather than reliance on ego or violence.

Bhīṣma continues a long enumerative benediction/invocation, calling upon sacred natural and cosmic entities to grant protection; this verse specifically invokes Somagiri and other mountains, the quarters and intermediate quarters, the earth, and all trees.