Bhaṅgāśvanopākhyāna — On comparative affection in strī–puruṣa union (भङ्गाश्वनोपाख्यानम्)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं) ऑपन--#रू< बक। है २ >> द्ादशोड् ध्याय: कृतघ्नकी गति और प्रायश्षित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान (युधिष्ठिर उदाच प्रायक्षित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह । बगिलिक [ गुरूंश्वैव येडवमन्यन्ति मोहिता: ।। पूछा--पितामह! जो मोहवश माता-पिता तथा गुरुजनोंका अपमान करते हैं उन कृतघ्नोंके लिये कया प्रायश्चित्त है? यह बताइये ।। ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपा: । तेषां गति महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। तात! महाबाहो! दूसरे भी जो निर्लज्ज एवं कृतघ्न हैं उनकी गति कैसी होती है? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वती: समा: । मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने ।। कृमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च । दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्भव: ।। भीष्मजीने कहा--तात! कृतघ्नोंकी एक ही गति है, सदाके लिये नरकमें पड़े रहना। जो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन नहीं रहते हैं वे कृमि, कीट, पिपीलिका और वृक्ष आदिकी योनियोंमें जन्म लेते हैं। मनुष्ययोनिमें फिर जन्म होना उनके लिये दुर्लभ हो जाता है ।। अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् | वत्सनाभो महाप्राज्ञों महर्षि: संशितव्रत: ।॥ वल्मीकभूतो ब्रद्वार्षिस्तप्यते सुमहत्तप: । इस विषयमें जानकार मनुष्य इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं। वत्सनाभ नामवाले एक परम बुद्धिमान् महर्षि कठोर व्रतके पालनमें लगे थे। उनके शरीरपर दीमकोंने घर बना लिया था; अतः वे ब्रह्मर्षि बाँबीरूप हो गये थे और उसी अवस्थामें वे बड़ी भारी तपस्या करते थे ।। तस्मिंश्न॒ तप्पति तपो वासवो भरतर्षभ ।। ववर्ष सुमहद् वर्ष सविद्युत्स्तनयित्नुमान् । भरतश्रेष्ठ] उनके तप करते समय इन्द्रनें बिजलीकी चमक और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी ।। तत्र सप्ताहवर्ष तु मुमुचे पाकशासन: । निमीलिताक्षस्तद्वर्ष प्रत्यगृह्नीत वै द्विज: ।। पाकशासन इन्द्रने लगातार एक सप्ताहतक वहाँ जल बरसाया और वे ब्राह्मण वत्सनाभ आँख मूँदकर चुपचाप उस वर्षाका आघात सहन करते रहे ।। तस्मिन् पतति वर्षे तु शीतवातसमन्विते । विशीर्णध्वस्तशिखरो वल्मीको5शनिताडित: ।। सर्दी और हवासे युक्त वह वर्षा हो ही रही थी कि बिजलीसे आहत हो उस वल्मीक (बाँबी)-का शिखर टूटकर बिखर गया ।। ताड्यमाने ततस्तस्मिन् वत्सनाभे महात्मनि । कारुण्यात् तस्य धर्म: स्वमानृशंस्थमथाकरोत् ।। अब महामना वत्सनाभपर उस वर्षाकी चोट पड़ने लगी। यह देख धर्मके हृदयमें करुणा भर आयी और उन्होंने वत्सनाभपर अपनी सहज दया प्रकट की ।। चिन्तयानस्य ब्रह्मूर्षि तपन्तमधिथधार्मिकम् | अनुरूपा मति: क्षिप्रमुपजाता स्वभावजा ।। तपस्यामें लगे हुए उन अत्यन्त धार्मिक ब्रह्मर्षिकी चिन्ता करते हुए धर्मके हृदयमें शीघ्र ही स्वाभाविक सुबुद्धिका उदय हुआ, जो उन्हींके अनुरूप थी ।। स्वं रूप॑ माहिषं कृत्वा सुमहान्तं मनोहरम् | त्राणार्थ वत्सनाभस्य चतुष्पादुपरि स्थित: ।। वे विशाल और मनोहर भैंसेका-सा अपना स्वरूप बनाकर वत्सनाभकी रक्षाके लिये उनके चारों ओर अपने चारों पैर जमाकर उनके ऊपर खड़े हो गये ।। यदा त्वपगतं वर्ष शीतवातसमन्वितम् । ततो महिषरूपी स धर्मो धर्मभृतां वर ।। शनैर्वल्मीकमुत्सृज्य प्राद्रवद् भरतर्षभ । स्थिते5स्मिन् वृष्टिसम्पाते रक्षित: स महातपा: ।। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतभूषण युधिष्ठिर! जब शीतल हवासे युक्त वह वर्षा बंद हो गयी तब भैंसेका रूप धारण करनेवाले धर्म धीरेसे उस वल्मीकको छोड़कर वहाँसे दूर खिसक गये। उस मूसलाधार वर्षामें महिषरूपधारी धर्मके खड़े हो जानेसे महातपस्वी वत्सनाभकी रक्षा हो गयी ।। दिश: सुविपुलास्तत्र गिरीणां शिखराणि च ।। दृष्टवा च पृथिवीं सर्वां सलिलेन परिप्लुताम् । जलाशयानू स तानू् दृष्ट्वा विप्र: प्रमुदितो5भवत् ।। तदनन्तर वहाँ सुविस्तृत दिशाओं, पर्वतोंके शिखरों, जलमें डूबी हुई सारी पृथ्वी और जलाशयोंको देखकर ब्राह्मण वत्सनाभ बहुत प्रसन्न हुए ।। अचिन्तयद् विस्मितश्न वर्षात् केनाभिरक्षित: । ततो<पश्यत् त॑ महिषमवस्थितमदूरत: ।। फिर वे विस्मित होकर सोचने लगे कि “इस वर्षासे किसने मेरी रक्षा की है। इतनेहीमें पास ही खड़े हुए उस भैंसेपर उनकी दृष्टि पड़ी ।। तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सल: । अतो नु भद्रे महिष: शिलापट्ट इव स्थित: । पीवरश्नैव शूल्यश्व बहुमांसो भवेदयम् ।। “अहो! पशुयोनिमें पैदा होकर भी यह कैसा धर्मवत्सल दिखायी देता है? निश्चय ही यह भैंसा मेरे ऊपर शिलापट्टके समान खड़ा हो गया था। इसीलिये मेरा भला हुआ है। यह बड़ा मोटा और बहुत मांसल है' ।। तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तिजा मुने: । कृतघ्ना नरकं यान्ति ये तु विश्वासघातिन: ।। तदनन्तर धर्ममें अनुराग होनेके कारण मुनिके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि “जो विश्वासघाती एवं कृतघ्न मनुष्य हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।। निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन । ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा ।। “मैं प्राण-त्यागके सिवा कृतघ्नोंके उद्धारका दूसरा कोई उपाय किसी तरह नहीं देख पाता। धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन भी ऐसा ही है ।। अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् । कृतघ्नतां च सम्प्राप्प मरणान्ता च निष्कृति: ।। 'पिता-माताका भरण-पोषण न करके तथा गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्नभावको प्राप्त हो गया हूँ। इस कृतघ्नताका प्रायश्षित्त है स्वेच्छासे मृत्युको वरण कर लेना ।। आकाड्ुक्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम् । तस्मात् प्राणान् परित्यक्ष्ये प्रायश्षित्तार्थमित्युत ।। “अपने कृतघ्न जीवनकी आकांक्षा और प्रायश्चित्तकी उपेक्षा करनेपर भी भारी उपपातक भी बढ़ता रहेगा। अतः मैं प्रायश्षित्तके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करूँगा” ।। स मेरुशिखरं गत्वा निस्सज्लेनान्तरात्मना । प्रायश्षित्तं कर्तुकाम: शरीर त्यक्तुमुद्यत: ।। निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित् ।। अनासक्त चित्तसे मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर प्रायश्चित्त करनेकी इच्छासे अपने शरीरको त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये। इसी समय धर्मने आकर उन थधर्मज्ञ, धर्मात्मा वत्सनाभका हाथ पकड़ लिया ।। धर्म उवाच वत्सनाभ महाप्राज्ञ बहुवर्षशतायुष: । परितुष्टो5स्मि त्यागेन नि:ःसड्रेन तथा55त्मन: ।। धर्मने कहा--महाप्राज्ञ वत्सनाभ! तुम्हारी आयु कई सौ वर्षोकी है। तुम्हारे इस आसक्तिरहित आत्मत्यागके विचारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ।। एवं धर्मभूत: सर्वे विमृशन्ति तथा कृतम् । नस कक्रिद् वत्सनाभ यस्य नोपहतं मनः ।। यश्चानवद्यश्नरति शक्तो धर्म तु सर्वशः | निवर्तस्व महाप्राज्ञ भूतात्मा हासि शाश्वत: ।।) इसी प्रकार सभी धर्मात्मा पुरुष अपने किये हुए कर्मकी आलोचना करते हैं। वत्सनाभ! जगत्में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जिसका मन कभी दूषित न हुआ हो। जो मनुष्य निन्द्य कर्मोंसे दूर रहकर सब तरहसे धर्मका आचरण करता है वही शक्तिशाली है। महाप्राज्ञ! अब तुम प्राणत्यागके संकल्पसे निवृत्त हो जाओ, क्योंकि तुम सनातन (अजर- अमर) आत्मा हो ।। युधिछिर उवाच स्त्रीपुंसयो: सम्प्रयोगे स्पर्श: कस्याधिको भवेत् । एतस्मिन् संशये राजन् यथावद् वक्तुमहसि,युधिष्ठिरने पूछा--राजन्! स्त्री और पुरुषके संयोगमें विषयसुखकी अनुभूति किसको अधिक होती है (स्त्रीको या पुरुषको)? इस संशयके विषयमें आप यथावत््रूपसे बतानेकी कृपा करें
yudhiṣṭhira uvāca |
prāyaścittaṃ kṛtaghnānāṃ pratibrūhi pitāmaha |
mātāpitr̥gurūṃś caiva ye ’vamanyanti mohitāḥ ||
ye cāpy anye pare tāta kṛtaghnā nirapatrapāḥ |
teṣāṃ gatiṃ mahābāho śrotum icchāmi tattvataḥ ||
യുധിഷ്ഠിരൻ പറഞ്ഞു— “പിതാമഹാ! മോഹവശരായി മാതാപിതാക്കളെയും ഗുരുക്കന്മാരെയും അപമാനിക്കുന്ന കൃതഘ്നർക്കുള്ള പ്രായശ്ചിത്തം എനിക്കു പറയുക. കൂടാതെ, താതാ, ലജ്ജയില്ലാത്ത മറ്റു കൃതഘ്നരുടെ ഗതി എന്താകുന്നു—മഹാബാഹോ—അത് ഞാൻ യഥാർത്ഥമായി കേൾക്കാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നു.”
युधिछिर उवाच
The passage frames ingratitude—especially toward parents and teachers—as a grave ethical failure and asks what corrective discipline (prāyaścitta) and ultimate destiny (gati) such conduct entails, highlighting the Mahābhārata’s emphasis on gratitude and reverence as pillars of dharma.
In the Anuśāsana Parva dialogue, Yudhiṣṭhira approaches Bhīṣma (addressed as Pitāmaha) with a moral inquiry: he seeks a truthful account of the expiation and fate of those who, through delusion and shamelessness, insult or neglect their parents and gurus.