यह सोपान ‘भक्ति-पराक्रम’ का द्वार है—जहाँ नाम-स्मरण, विनय, और धर्म-युक्त क्रोध (मर्यादा-रक्षा) एक साथ साधक को ‘अहं-त्याग’ से ‘सेवा-सिद्धि’ तक ले जाते हैं। सुंदरकाण्ड में बाह्य यात्रा (समुद्र-लङ्का) अंतःयात्रा बनती है: संशय → संकल्प → विनय → शरणागति → कृपा-प्राप्ति। प्रस्तुत खण्ड विशेषतः ‘मर्यादा-भंग पर दण्ड’ और ‘विनय न मानने पर भय’ की नीति से साधक को सिखाता है कि ईश्वर-कृपा आलस्य-आश्रित ‘दैव-दैव’ नहीं, पुरुषार्थ-समन्वित शरणागति से प्रकट होती है।
यह खण्ड ‘भक्ति-पराक्रम’ का पाठ है: (1) ‘दैव-दैव’ कहकर आलस्य नहीं—शरणागति के साथ पुरुषार्थ अनिवार्य; लक्ष्मण का संकल्प साधक के भीतर कर्म-शक्ति जगाता है। (2) क्रोध का रूपान्तरण: रौद्र यहाँ अहं-प्रेरित नहीं, मर्यादा-रक्षा हेतु धर्म-नियंत्रित ऊर्जा है। (3) नीति-त्रय (दण्ड–दया–संदेश): भक्ति केवल कोमलता नहीं; अधर्म के प्रति कठोरता, परन्तु सुधार-सम्भावना के प्रति करुणा। (4) अहंकार का पतन-बीज: रावण का दर्प विवेक/नीति को निष्फल करता है—‘अनसुनी’ ही विनाश का द्वार। (5) समुद्र का भयभीत विनय: प्रकृति/परिस्थिति (समुद्र) भी प्रभु-आज्ञा से चलती है; साधक के लिए यह ‘ईश्वर-प्रधानता’ और ‘विनय से मार्ग’ का प्रतीक है—अंततः मार्ग (सेतु/उपाय) कृपा से खुलता है, पर कृपा पुरुषार्थ-संयुक्त विनय पर प्रकट होती है।
Verse 1 (श्लोक)
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।। नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।। अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।
Verse 2 (चौपाई)
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।। तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।। जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।। यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।। सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।। बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।। जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।। जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।। जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
Verse 3 (दोहा/सोरठा)
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।
Verse 4 (चौपाई)
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।। सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।। आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।। राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।। तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।। कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।। जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।। सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।। जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।। सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।। बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।। मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
Verse 5 (दोहा/सोरठा)
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।
Verse 6 (चौपाई)
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।। जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।। गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।। सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।। ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।। तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।। नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।। सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।। उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।। गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।। अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
Verse 7 (छंद)
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।। गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।। बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।। कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।। करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।। एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।
Verse 8 (दोहा/सोरठा)
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।
Verse 9 (चौपाई)
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।। नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।। जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।। मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।। पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।। जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।। बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।। तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
Verse 10 (दोहा/सोरठा)
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।
Verse 11 (चौपाई)
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।। गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।। गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।। अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।। मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।। गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।। सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।। भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
Verse 12 (दोहा/सोरठा)
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।
Verse 13 (चौपाई)
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।। मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।। राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।। एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।। बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।। करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।। की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।। की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
Verse 14 (दोहा/सोरठा)
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।
Verse 15 (चौपाई)
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।। तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।। तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।। अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।। जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।। सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।। कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।। प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
Verse 16 (दोहा/सोरठा)
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।
Verse 17 (चौपाई)
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।। एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।। पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।। तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।। जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।। करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।। देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।। कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
Verse 18 (दोहा/सोरठा)
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
Verse 19 (चौपाई)
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।। तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।। बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।। कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।। तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।। तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।। सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।। अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।। सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
Verse 20 (दोहा/सोरठा)
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।
Verse 21 (चौपाई)
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।। नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।। स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।। सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।। चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।। सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।। सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।। कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।। मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
Verse 22 (दोहा/सोरठा)
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
Verse 23 (चौपाई)
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।। रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।। अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।। कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।। निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।। हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।। मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।। कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।। सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
Verse 24 (दोहा/सोरठा)
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।
Verse 25 (चौपाई)
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।। आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।। अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।। करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।। बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।। अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।। सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।। सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।। तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
Verse 26 (दोहा/सोरठा)
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।
Verse 27 (चौपाई)
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।। रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।। नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।। खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।। सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।। सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।। पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।। आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
Verse 28 (दोहा/सोरठा)
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।
Verse 29 (चौपाई)
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।। मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।। चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।। कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।। अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।। रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।। तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा। मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।। उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
Verse 30 (दोहा/सोरठा)
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।
Verse 31 (चौपाई)
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।। तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।। जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।। तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।। कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।। दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।। कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।। देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
Verse 32 (दोहा/सोरठा)
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।
Verse 33 (चौपाई)
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।। जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।। तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।। हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।। साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।। जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।। ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।। उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
Verse 34 (दोहा/सोरठा)
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।
Verse 35 (चौपाई)
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।। चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।। कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।। दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।। तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।। मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।। कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।। तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
Verse 36 (दोहा/सोरठा)
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।
Verse 37 (चौपाई)
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।। नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।। हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।। मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।। मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।। चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।। तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।। रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
Verse 38 (दोहा/सोरठा)
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज। सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।
Verse 39 (चौपाई)
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।। एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।। आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।। पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।। नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।। सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ। राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।। फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
Verse 40 (दोहा/सोरठा)
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज। पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।
Verse 41 (चौपाई)
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।। ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।। सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।। प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।। नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।। पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।। सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।। कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
Verse 42 (दोहा/सोरठा)
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।
Verse 43 (चौपाई)
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।। नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।। अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।। मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।। अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।। नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।। बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।। नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी। सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
Verse 44 (दोहा/सोरठा)
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।
Verse 45 (चौपाई)
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।। बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।। कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।। केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।। सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।। प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।। सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।। पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
Verse 46 (दोहा/सोरठा)
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।
Verse 47 (चौपाई)
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।। प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।। सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।। कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।। कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।। प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।। साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।। नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा। सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
Verse 48 (दोहा/सोरठा)
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल। तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।
Verse 49 (चौपाई)
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।। सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।। उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।। यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।। सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।। तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।। अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।। कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
Verse 50 (दोहा/सोरठा)
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।
Verse 51 (चौपाई)
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।। देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।। राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।। हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।। जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।। प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।। जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।। चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।। नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।। केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
Verse 52 (चौपाई)
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।। तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।। रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।। माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।। सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।। जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।। तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।। कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
Verse 53 (दोहा/सोरठा)
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
Verse 54 (चौपाई)
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।। सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।। जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।। कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।। मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।। अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।। उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।। तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।। सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
Verse 55 (दोहा/सोरठा)
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।
Verse 56 (चौपाई)
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।। साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।। रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।। चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।। देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।। जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।। जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।। हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
Verse 57 (दोहा/सोरठा)
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।
Verse 58 (चौपाई)
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।। कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।। ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।। कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।। कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।। जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।। भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।। सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।। सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
Verse 59 (दोहा/सोरठा)
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।
Verse 60 (चौपाई)
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।। सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।। पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।। जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।। निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।। जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।। जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
Verse 61 (दोहा/सोरठा)
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।
Verse 62 (चौपाई)
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।। दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।। बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।। भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।। सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।। नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।। नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।। सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
Verse 63 (दोहा/सोरठा)
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।
Verse 64 (चौपाई)
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।। दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।। अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।। कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।। खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।। मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।। बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।। अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
Verse 65 (दोहा/सोरठा)
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।
Verse 66 (चौपाई)
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।। जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।। ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।। तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।। अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।। तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।। मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।। जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
Verse 67 (दोहा/सोरठा)
-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।
Verse 68 (चौपाई)
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।। जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।। तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।। जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।। सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।। समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।। अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।। तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
Verse 69 (दोहा/सोरठा)
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।
Verse 70 (चौपाई)
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।। राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।। सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।। पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।। सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।। उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।। अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।। एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।। जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।। अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
Verse 71 (दोहा/सोरठा)
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।। जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।
Verse 72 (चौपाई)
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।। निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।। पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।। बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।। सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।। संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।। कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।। जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
Verse 73 (दोहा/सोरठा)
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।
Verse 74 (चौपाई)
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।। मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।। नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।। कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।। सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।। अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।। प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।। जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
Verse 75 (दोहा/सोरठा)
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।
Verse 76 (चौपाई)
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।। रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।। कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।। सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।। बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।। जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।। सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।। रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
Verse 77 (दोहा/सोरठा)
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।
Verse 78 (चौपाई)
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।। कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।। बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।। पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।। करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।। पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।। जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।। कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
Verse 79 (दोहा/सोरठा)
-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।
Verse 80 (चौपाई)
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।। मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।। रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।। श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।। पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।। नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।। जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।। अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
Verse 81 (दोहा/सोरठा)
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।
Verse 82 (चौपाई)
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।। राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।। अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।। नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।। परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।। सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।। मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।। गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
Verse 83 (दोहा/सोरठा)
-सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।
Verse 84 (चौपाई)
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।। सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।। तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।। सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।। सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।। मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।। सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।। सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।। रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।। बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
Verse 85 (दोहा/सोरठा)
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।। की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।
Verse 86 (चौपाई)
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।। भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।। कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।। सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।। अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।। मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।। जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे। जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।। नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।। करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।। रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।। बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
Verse 87 (दोहा/सोरठा)
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
Verse 88 (चौपाई)
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।। सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।। ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।। क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।। अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।। संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।। मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।। कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
Verse 89 (दोहा/सोरठा)
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
Verse 90 (चौपाई)
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।। तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।। प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।। प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।। ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।। प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।। प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
Verse 91 (दोहा/सोरठा)
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।
Verse 92 (दोहा/सोरठा)
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।
bhavana gayau dasakandhara ihā̃ pisācini bṛnda. sītahi trāsa dekhāvahi dharahĩ rūpa bahu manda..10..
When the ten-necked Ravana had gone back to his palace, a troop of fiendish demonesses there set about terrifying Sita, assuming many vile and hideous forms.
Verse 93 (चौपाई)
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।। सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।। सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।। खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।। एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।। नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।। यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।। तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
trijaṭā nāma rācchasī ekā. rāma carana rati nipuna bibekā.. sabanhaũ boli sunāesi sapanā. sītahi sei karahu hita apanā.. sapanẽ bānara laṅkā jārī. jātudhāna senā saba mārī.. khara ārūṛha nagana dasasīsā. muṇḍita sira khaṇḍita bhuja bīsā.. ehi bidhi so dacchina disi jāī. laṅkā manahũ bibhīṣana pāī.. nagara phirī raghubīra dohāī. taba prabhu sītā boli paṭhāī.. yaha sapanā maĩ kahaũ pukārī. hoihi satya gaẽ dina cārī.. tāsu bacana suni te saba ḍarī̃. janakasutā ke carananhĩ parī̃..
There was one demoness named Trijata, wise in discernment and devoted to Rama’s feet. Calling all the others, she told them her dream: ‘Serve Sita—seek your own welfare. In the dream a monkey set Lanka ablaze; the demon host was all destroyed. Naked, Ravana rode on a donkey—his head shaven, his twenty arms broken—and thus he went off toward the south, as though Lanka had already fallen to Vibhishana. Then, with “Victory to Raghu’s hero!” resounding, the city was circled, and the Lord sent for Sita. This dream I proclaim aloud: within four days it shall come true.’ Hearing her words, they all grew afraid and fell at Janaka’s daughter’s feet.
Verse 94 (दोहा/सोरठा)
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।
jahã tahã gaī̃ sakala taba sītā kara mana soca. māsa divasa bītẽ mohi mārihi nisicara poca..11..
When all those demonesses had gone off in every direction, Sita’s heart sank into anxious thought: ‘When the month’s days are over, those vile night-roamers will kill me.’
Verse 95 (चौपाई)
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।। तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।। आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।। सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।। सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।। निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।। कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।। देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।। पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।। सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।। नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।। देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
trijaṭā sana bolī kara jorī. mātu bipati saṅgini taĩ morī.. tajaũ deha karu begi upāī. dusahu birahu aba nahĩ sahi jāī.. āni kāṭha racu citā banāī. mātu anala puni dehi lagāī.. satya karahi mama prīti sayānī. sunai ko śravan sūla sama bānī.. sunata bacana pada gahi samujhāesi. prabhu pratāpa bala sujasu sunāesi.. nisi na anala mila sunu sukumārī. asa kahi so nija bhavana sidhārī.. kaha sītā bidhi bhā pratikūlā. milahi na pāvaka miṭihi na sūlā.. dekhiata pragaṭa gagana aṅgārā. avani na āvata ekau tārā.. pāvakamaya sasi stravata na āgī. mānahũ mohi jāni hatabhāgī.. sunahi binaya mama biṭapa asokā. satya nāma karu haru mama sokā.. nūtana kisalaya anala samānā. dehi agini jani karahi nidānā.. dekhi parama birahākula sītā. so chana kapihi kalapa sama bītā..
With folded hands Sita spoke to Trijata: ‘Mother, you are my companion in this calamity. Find some swift means for me to quit this body; I can bear this cruel separation no longer. Bring wood, build a pyre, and then, mother, set it alight for me. You are wise—make my love come true; who can endure words that pierce the ear like a lance?’ Hearing this, Trijata clasped her feet and reasoned with her, recounting the Lord’s majesty, might, and spotless fame. ‘Listen, tender one: tonight no fire will be found.’ Saying so, she returned to her dwelling. Sita said, ‘Fate has turned against me: no fire will be found, nor will my agony be ended. The sky shows embers openly; not a single star appears. The moon seems made of fire, yet sheds no flame—as though it knows me for ill-starred.’ ‘Hear my plea, O Ashoka tree: by the True Name, remove my sorrow. Your fresh shoots are like fire; do not become the cause of my burning.’ Seeing Sita overwhelmed by separation, that moment passed for the monkey as though it were an age.
Verse 96 (दोहा/सोरठा)
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब। जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
kapi kari hṛdayã bicāra dīnhi mudrikā ḍārī taba. janu asoka aṅgāra dīnhi haraṣi uṭhi kara gaheu..12..
After turning the matter over in his heart, the monkey then dropped the signet-ring. Sita, as though she had been given a live ember amid the Ashoka grove, rose up in joy and caught it in her hand.
Verse 97 (चौपाई)
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।। चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।। जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।। सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।। रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।। लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।। श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।। तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।। राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।। यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।। नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
taba dekhī mudrikā manohara | rāma nāma aṅkita ati sundara || cakita citava mudarī pahicānī | haraṣa biṣāda hṛdayaṁ akulānī || jīti ko sakai ajaya raghurāī | māyā teṁ asi raci nahiṁ jāī || sītā mana bicāra kara nānā | madhura bacana boleu hanumānā || rāmacandra guna baranaiṁ lāgā | sunatahiṁ sītā kara dukha bhāgā || lāgīṁ sunaiṁ śravaṇa mana lāī | ādihu teṁ saba kathā sunāī || śravaṇāmṛta jehiṁ kathā suhāī | kahi so pragaṭa hoti kina bhāī || taba hanumaṁta nikaṭa cali gayau | phiri baiṁṭhīṁ mana bisamaya bhayau || rāma dūta maiṁ mātu jānaki | satya sapatha karuṇā-nidhāna kī || yaha mudrikā mātu maiṁ ānī | dīnhि rāma tumha kahaṁ sahidānī || nara bānarahi saṅga kahu kaisēṁ | kahi kathā bhai saṅgati jaisēṁ ||
Then she saw the lovely signet-ring, most fair, with the Name of Rāma engraved upon it. Startled, she gazed and recognized the ring; joy and sorrow together made her heart unquiet. “How could any conquer the unconquerable Lord of Raghu? Such a thing cannot be fashioned by mere illusion.” Sītā pondered in many ways; then Hanumān spoke with gentle, honeyed words. He began to recount the virtues of Rāmacandra; and as she listened, Sītā’s grief fled away. She listened with ear and mind intent; from the beginning he told the whole account. “The tale that is nectar to the ear—why should one not speak it, brother, so that it becomes manifest?” Then Hanumān drew near; and she sat again, her mind filled with wonder. “I am Rāma’s messenger, Mother Jānakī—by the true oath of the Treasure of Compassion. This ring I have brought, Mother, given by Rāma to you as sure witness. ‘But how did a man come into fellowship with a monkey?’—he told the story, and the meeting was understood as it had come to be.
Verse 98 (दोहा/सोरठा)
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।। जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।
kapi ke bacana sa-prema suni upajā mana bisvāsa || jānā mana krama bacana yaha kṛpāsiṁdhu kara dāsa ||13||
Hearing the monkey’s words, spoken with love, faith arose within her heart. She knew—by his mind, his manner, and his speech—that he was the servant of the Ocean of Grace. (13)
Verse 99 (चौपाई)
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।। बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।। अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।। कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।। सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।। कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।। बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।। देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।। मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।। जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
harijana jāni prīti ati gāṛhī | sajala nayana pulakāvali bāṛhī || būṛata biraha jaladhi hanumānā | bhayau tāta moṁ kahuṁ jalajānā || aba kahu kusala jāuṁ balihārī | anuj sahita sukha bhavana kharārī || komalacita kṛpāla raghurāī | kapi kehi hetu dharī niṭhurāī || sahaja bāni sevaka sukhadāyaka | kabahuṁka surati karata raghunāyaka || kabahuṁ nayana mama sītala tātā | hoihahi nirakhi syāma mṛdu gātā || bacanu na āva nayana bhare bārī | ahaha nātha hauṁ nipaṭa bisārī || dekhi parama birahākula sītā | bolā kapi mṛdu bacana binītā || mātu kusala prabhu anuj sametā | tava dukha dukhī sukṛpā niketā || jani jananī mānahu jiyaṁ ūnā | tumha te premu rāma keṁ dūnā ||
Knowing him to be the Lord’s own, her love grew exceedingly deep; her eyes grew wet and waves of rapture ran through her. As though drowning in the ocean of separation, Hanumān seemed to her a son who knew the waters of such grief. “Now tell me of his welfare—I bow my head!—Rāma, the slayer of Khara, that home of joy, with his younger brother. Tender-hearted and compassionate is the Lord of Raghu—why then has the monkey taken on such hardness? His very nature is to gladden his servants; does Raghunāth ever remember me at all? Will my eyes ever be cooled, dear one, by beholding his dark, gentle form? No words come; tears fill my eyes: ‘Alas, my lord, I am utterly forgotten!’ Seeing Sītā in the extremity of separation, the monkey spoke softly, with humility: ‘Mother, the Lord is well, with his younger brother; that abode of grace grieves at your grief. Do not, Mother, deem yourself lacking in heart—Rāma’s love is greater than yours.’
Verse 100 (दोहा/सोरठा)
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।
raghupati kara saṁdesu aba sunu jananī dhari dhīra | asa kahi kapi gada-gada bhayau bhare bilocana nīra ||14||
“Now hear the message of the Lord of Raghu, Mother—hold fast your courage.” So saying, the monkey’s voice grew choked, and his eyes brimmed with tears. (14)
Verse 101 (चौपाई)
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।। नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।। कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।। जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।। कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।। तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।। सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।। प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।। कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।। उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
kaheu rāma biyoga tava sītā | mo kahuṁ sakala bhae biparītā || nava taru kisalaya manahuṁ kṛsānū | kālanisā sama nisi sasi bhānū || kubalaya bipina kuṁta bana sarisā | bārida tapata tela janu barisā || je hita rahe karata tei pīrā | uraga svāsa sama tribidha samīrā || kahehū teṁ kachu dukha ghaṭi hoī | kāhi kahauṁ yaha jāna na koī || tatva prema kara mama aru torā | jānata priyā eku manu morā || so manu sadā rahata tohi pāhīṁ | jānu prīti rasu etenahi māhīṁ || prabhu saṁdesu sunata baidehī | magana prema tana sudhi nahiṁ tehī || kaha kapi hṛdayaṁ dhīra dharu mātā | sumiru rāma sevaka sukhadātā || ura ānahu raghupati prabhutāī | suni mama bacana tajahu kadarāī ||
“Rāma has spoken: ‘In your separation, Sītā, all things have become contrary for me. The tender shoots of new trees seem like fire; the moon and sun in the night are as a pitch-black darkness. The grove of water-lilies is like a forest of spears; the clouds seem to rain down scorching oil. Those very things that once were dear now cause pain; the breath is like a serpent, the wind a threefold torment. If I speak, perhaps the sorrow may lessen—but to whom shall I tell it? none can truly know this. The very truth of love—mine and yours—is known, beloved, to my single heart. That heart ever abides with you; know that the essence of love is contained in this.’ Hearing the Lord’s message, Vaidehī was so absorbed in love that she forgot her body. Then the monkey said: ‘Mother, hold firmness in your heart; remember Rāma, the giver of joy to his servants. Bring into your breast the Lord of Raghu’s sovereign might; hearing my words, cast away all faintheartedness.’
Verse 102 (दोहा/सोरठा)
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।
kapihi biloki dasānana bihasā kahi durbāda | suta-badha surati kīnhi puni upajā hṛdayã biṣāda ||20||
Seeing the monkey, the ten-faced Ravana laughed and spoke insolent abuse. Yet as he recalled the slaying of his son, grief once more rose within his heart.
Verse 103 (चौपाई)
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।। की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।। मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।। सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।। जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा। जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।। धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता। हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।। खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
kaha laṅkesa kavan taĩ kīsā | kehĩ ke bala ghālehi bana khīsā || kī dhaũ śravaṇa sunehi nahĩ mohī | dekhaũ ati asaṅka saṭh tohī || māre nisicara kehĩ aparādhā | kahu saṭh tohi na prāna kai bādhā || suna rāvana brahmāṇḍa nikāyā | pāi jāsu bala biracita māyā || jāke bala birañci hari īsā | pālata sṛjata harata dasasīsā || jā bala sīsa dharata sahasānana | aṇḍakosa sameta giri kānana || dharai jo bibidha deha suratrātā | tumha te saṭhanha sikhāvanu dātā || hara kodaṇḍa kaṭhina jehi bhañjā | tehi sameta nṛpa dala mada gañjā || khara dūṣana trisirā aru bālī | badhe sakala atulita balasālī ||
The lord of Lanka said, 'Who are you, monkey? By whose strength have you wrecked the grove in mere sport? Have you no ears to hear me—how do I see you so shamelessly fearless? For what offense did you slay the night-roamers? Tell me, wretch—do you not care for your life?' Hear me, Ravana: the vast cosmos stands only by the power of Him whose māyā has shaped it. By His strength Brahma, Vishnu, and Shiva create, sustain, and dissolve; by that very power the thousand-hooded bearer upholds the universe with its mountains and forests. That protector of the gods takes diverse forms—yet you, fool, would presume to instruct Him! He who broke the hard Kodanda bow and crushed the pride of kings with their armies—he slew Khara, Dushana, Trishira, and Bali, all of incomparable might.
Verse 104 (दोहा/सोरठा)
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।
jāke bala lavalesa tẽ jitehu carācara jhāri | tāsu dūta maĩ jā kari hari ānehu priya nāri ||21||
By but the slightest fraction of whose power you could conquer all that moves and all that stands—of that very Lord I am the messenger, come to reclaim His beloved.
Verse 105 (चौपाई)
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।। समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।। खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।। सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।। जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।। मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।। बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।। देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।। जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।। तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
jānaũ maĩ tumhāri prabhutāī | sahasabāhu sana parī larāī || samara bāli sana kari jasu pāvā | suni kapi bacana bihasi biharāvā || khāyaũ phala prabhu lāgī bhū̃khā | kapi subhāva tẽ toreũ rūkhā || saba kẽ deha parama priya svāmī | mārahĩ mohi kumāraga gāmī || jinh mohi mārā te maĩ māre | tehi para bā̃dheu tanayã tumhāre || mohi na kachu bā̃dhe kai lājā | kīnha cahaũ nija prabhu kara kājā || binatī karaũ jori kara rāvan | sunahu māna taji mora sikhāvana || dekhahu tumha nija kulahi bicārī | bhrama taji bhajahu bhagata bhaya hārī || jākẽ ḍara ati kāla ḍerāī | jo sura asura carācara khāī || tāsõ bayaru kabahũ nahĩ kījai | more kahẽ jānakī dījai ||
I know your lordly power—you once fought Sahasrabahu; you won renown in battle with Bali. Hearing the monkey’s words, he laughed and spoke at ease: 'I ate fruit because I was hungry; by a monkey’s nature I uprooted trees. To every being its body is dearest; those who were on the wrong path struck at me. I slew those who struck me—and therefore I bound your son. I feel no shame in being bound; I wish only to accomplish my Lord’s work. With joined hands I entreat you, Ravana—cast off pride and heed my counsel. Consider your lineage; abandon delusion and worship the Lord who takes away the fear of His devotees. Against Him, before whose dread even Death trembles—He who devours gods, demons, and all that moves and stands—never make enmity. By my word, give Janaki back.'
Verse 106 (दोहा/सोरठा)
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।
pranatapāla raghunāyaka karuṇā siṅdhu kharāri | gaẽ saraṇa prabhu rākhihaĩ tava aparādha bisāri ||22||
Rama, lord of the Raghus—guardian of the surrendered, ocean of compassion, slayer of Khara: whoever comes to His refuge, the Lord will protect, setting aside your offenses.
Verse 107 (चौपाई)
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।। रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।। राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।। बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।। राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।। सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।। सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।। संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
rāma carana paṅkaja ura dharahū | laṅkā acala rāja tumha karahū || ṛṣi pulista jasu bimala maṁyakā | tehi sasi mahuṁ jani hohu kalaṅkā || rāma nāma binu girā na sohā | dekhu bicāri tyāgi mada mohā || basana hīna nahiṁ soha surārī | saba bhūṣaṇa bhūṣita bara nārī || rāma bimukha saṁpati prabhutāī | jāi rahī pāī binu pāī || sajala mūla jinha saritanha nāhīṁ | baraṣi gae puni tabahiṁ sukhāhīṁ || sunu dasakaṇṭha kahuṁ pana ropī | bimukha rāma trātā nahiṁ kopī || saṅkara sahasa biṣṇu aja tohī | sakahiṁ na rākhi rāma kara drohī ||
Enshrine the lotus-feet of Rama within your heart; then you shall rule Lanka with unshaken sovereignty. Do not stain, like a blemish upon the moon, the stainless fame of the sage Pulastya’s line. Without Rama’s Name, speech itself has no grace—reflect, and abandon pride and delusion. Even the finest woman, adorned with every ornament, does not shine if she lacks a garment; so too splendour without dharma is shame. Wealth and lordship, when turned away from Rama, slip away—won, yet in truth unwon. Rivers whose roots hold no water dry up as soon as the rains have passed. Hear me, O Ten-necked: I speak a vow planted firm—apart from Rama, there is no protector, even if He be wrathful. A thousand Shivas, Vishnu, and Brahma cannot save one who bears enmity toward Rama.
Verse 108 (दोहा/सोरठा)
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
mohamūla bahu sūla prada tyāgahu tama abhimāna | bhajahu rāma raghunāyaka kṛpā siṁdhu bhagavāna ||23||
Abandon ego-pride, that dark root which yields a multitude of pains. Worship Rama, Lord of the Raghus—the ocean of mercy, the Blessed God. (23)
Verse 109 (चौपाई)
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।। बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।। मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।। उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।। सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।। सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए। नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।। आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।। सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
jadapi kahi kapi ati hita bānī | bhagati bibeka बिरति naya sānī || bolā bihasi mahā abhimānī | milā hamahi kapi gur baṛa gyānī || mṛtyu nikaṭ āī khala tohī | lāgesi adhama sikhāvana mohī || ulaṭā hoihi kaha hanumānā | mati-bhrama tora pragaṭ maiṁ jānā || suni kapi bacana bahuta khisiānā | begi na harahuṁ mūṛha kara prānā || sunata nisācara mārana dhāe | sacivanha sahita bibhīṣanu āe || nāi sīsa kari binaya bahūtā | nīti birodha na māri-a dūtā || āna daṇḍa kachu kari-a gosāṁī | sabahīṁ kahā maṁtra bhala bhāī || sunata bihasi bolā dasakaṇdhara | aṅga bhaṅga kari paṭha-i-a baṁdara ||
Though the monkey spoke words wholly for Ravana’s good—seasoned with devotion, discernment, detachment, and sound policy— The great egoist laughed and said, “We have met a mighty learned guru in this monkey! Death has drawn near to you, wretch; and you, vile one, have come to instruct me!” Hanuman replied, “All shall turn against you—your delusion of mind stands plain to me.” Hearing the monkey’s words, Ravana burned with rage: “Why do you not at once take this fool’s life?” At the command, the rakshasas rushed to kill; then Vibhishana arrived with the ministers. Bowing his head, he pleaded much: “It violates policy and dharma to slay an envoy. Let some other punishment be devised, O Lord”—all approved the counsel. Hearing this, the Ten-necked laughed: “Maim the monkey’s limbs and send him away.”
Verse 110 (दोहा/सोरठा)
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।
kapi keṁ mamatā pūṁcha para sabahi kahauṁ samujhāi | tela bori paṭ bāṁdhi puni pāvaka dehu lagāi ||24||
“The monkey’s fondest attachment is to his tail—so I explain to you all: Soak cloth in oil, bind it on, and then set it alight.” (24)
Verse 111 (चौपाई)
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।। जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।। बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।। जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।। रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।। कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।। बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।। पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।। निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
pūṁchahīna bānara tahaṁ jāihi | taba saṭha nija nāthahi lai āihi || jinha kai kīnhasi bahuta baṛāī | dekheuṁ maiṁ tinha kai prabhutāī || bacana sunata kapi mana musukānā | bhai sahāya sārad maiṁ jānā || jātudhāna suni rāvana bacanā | lāge racaĩ mūṛha soi racanā || rahā na nagara basana ghṛta telā | bāṛhī pūṁcha kīnha kapi khelā || kautuka kahaṁ āe purabāsī | mārahiṁ carana kara hiṁ bahu hāṁsī || bājahiṁ ḍhola dehiṁ saba tārī | nagara pheri puni pūṁcha prajā rī || pāvaka jarata dekhi hanumaṁtā | bhayau parama laghu rūpa turaṁtā || nibuki caṛheu kapi kanaka aṭārīṁ | bhaī sabhīta nisācara nārīṁ ||
“A tailless monkey will go back; then that fool will bring him to his own master.” “I have seen the might of those whom you have so greatly praised.” Hearing this, the monkey smiled within; I knew Sharada herself had come to aid. The rakshasas, hearing Ravana’s command, set about—fools—devising that very scheme. In the city there remained no cloth, no ghee, no oil; the monkey sportively made his tail grow vast. Citizens came merely for amusement—kicking at him, laughing loudly. Drums resounded and all clapped; they paraded him through the city and then set his tail ablaze. Seeing the fire burn, Hanuman at once became exceedingly small, And slipping free, the monkey climbed to the golden terraces; the rakshasa women were struck with terror.
Verse 112 (छंद)
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।। कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1। सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई। रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।
cikkarahiṁ diggaja ḍola mahi giri lola sāgara kharabhare | mana haraṣa sabha gandharba sura muni nāga kinnar dukha ṭare || kaṭakaṭahiṁ markaṭa bikaṭa bhaṭa bahu koṭi koṭinih dhāvahīṁ | jaya rāma prabala pratāpa kosalanātha guna gana gāvahīṁ ||1|| sahi saka na bhāra udāra ahipati bāra bārahiṁ mohī | gaha dasana puni puni kamaṭha pṛṣṭha kaṭhora so kimi sohī | raghubīra rucira prayāna prasthiti jāni parama suhāvanī | janu kamaṭha kharpara sarparāja so likhata abicala pāvanī ||2||
The quarter-elephants bellow; the earth reels; mountains rock; the ocean roars in turmoil. All hearts are gladdened—Gandharvas, gods, sages, Nāgas, and Kinnaras—while their distress is dispelled. The fierce monkey-hosts crash onward in countless crores, singing: “Victory to Rāma—mighty in prowess—Lord of Kosala; we hymn the multitude of His virtues.” The generous serpent-lord cannot bear the burden; again and again he is bewildered. Gripping his teeth, he repeatedly presses upon the hard back of the Tortoise—how could that firm support not be fitting? Knowing the splendid march and auspicious setting forth of Raghu’s hero, it is as though the Serpent-king, upon the Tortoise’s shell, is inscribing an unshakable, sanctifying record.
Verse 113 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
ehi bidhi jāi kṛpānidhi utare sāgara tīra | jahã tahã lāge khāna phala bhālu bipula kapi bīra ||35||
Thus journeying, the Treasure-house of compassion came down upon the ocean’s shore; and bears and the multitude of heroic monkeys, here and there, set about eating fruits.
Verse 114 (चौपाई)
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।। निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।। जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।। दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।। रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।। कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।। समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।। तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।। तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।। सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
uhā̃ nisācara rahahiṁ sa-saṅkā | jaba te jāri gayau kapi laṅkā || nija nija gṛhã saba karahiṁ bicārā | nahiṁ nisīcara kula kera ubārā || jāsu dūta bala barani na jāī | tehi āẽ pura kavan bhalāī || dūtanhã sana suni purajana bānī | mandodarī adhika akulānī || rahasi jori kara pati paga lāgī | bolī bacana nīti rasa pāgī || kaṁta karaṣa hari sana pariharahū | mora kahā ati hita hiyã dharahū || samujhata jāsu dūta kai karanī | stravahīṁ garbha rajanīcara dharanī || tāsu nāri nija saciva bolāī | paṭhavahu kaṁta jo cahahu bhalāī || taba kula kamala bipina dukhadāī | sītā sīta nisā sama āī || sunahu nātha sītā binu dīnhẽ | hita na tumhār sambhu aja kīnhẽ ||
There the night-roamers lived in dread from the day the monkey burned Lanka. Each in his own house pondered: “There is no deliverance for the demon clan.” “He whose messenger’s might cannot be described—what good can come to the city if He Himself has come?” Hearing the citizens’ words, Mandodarī grew greatly agitated. In private, with folded hands, she touched her husband’s feet and spoke, steeped in prudent counsel: “My lord, withdraw from conflict with Hari; hold in your heart what I say for your true good. To grasp what His messenger has done—women of the rākṣasas miscarry from terror. Call your ministers and send her back, if you desire welfare.” Then, as a cold night to the lotus-grove of the lineage, Sītā came—bringing pain. “Hear me, O master: without giving Sītā back, neither Śiva nor Brahmā has wrought your good.”
Verse 115 (दोहा/सोरठा)
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।
rāma bāna ahi-gana sarisa nikara nisācara bheka | jaba lagi grasata na taba lagi jatanu karahu taji ṭeka ||36||
Rama’s arrows are like a host of serpents; the demons are but a swarm of frogs. Until you are swallowed, strive for remedy—abandon stubborn pride.
Verse 116 (चौपाई)
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।। सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।। जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।। कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।। अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।। मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।। बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।। बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।। जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
śravan sunī saṭha tā kari bānī | bihasā jagata bidita abhimānī || sabhaya subhāu nāri kara sācā | maṅgala mahũ bhaya mana ati kācā || jaũ āvai markaṭa kaṭakāī | jīahĩ bicāre nisicara khāī || kaṁpahĩ lokapa jāki trāsā | tāsu nāri sabhīta baṛi hāsā || asa kahi bihasi tāhi ura lāī | caleu sabhā̃ mamatā adhikāī || mandodarī hṛdayã kara ciṁtā | bhayau kaṁta para bidhi biparītā || baiṭheu sabhā̃ khabari asi pāī | siṁdhu pāra senā saba āī || būjhesi saciva ucita mata kahahū | te saba haṁse maṣṭa kari rahahū || jitehu surāsura taba śrama nāhīṁ | nara bānara kehi lekhe māhī ||
Hearing that foolish speech, the world-famed arrogant one laughed. A woman’s nature is truly timid; even in auspiciousness her mind is frail with fear. “If the monkey-host comes, those wretches will be eaten alive,” he scoffed. “He before whom the very guardians of the worlds tremble—his wife is afraid: what a great jest!” So saying, laughing, he clasped her to his breast and went to the court, his possessiveness increased. Mandodarī’s heart was anxious: fate had turned against her lord. He sat in council when news arrived: the entire army had come across the sea. He asked the ministers, “Speak the proper counsel.” They all remained smugly laughing. “I conquered gods and demons without effort—what account are men and monkeys?”
Verse 117 (दोहा/सोरठा)
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।
saciva baida gur tīni jauṃ priya bolahiṃ bhaya āsa | rāja-dharma tana tīni kara hoi begihīṃ nāsa ||37||
If a minister, a physician, and a guru speak only what is pleasing—out of fear or hope—then through these three the very body of kingly dharma swiftly comes to ruin.
Verse 118 (चौपाई)
सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।। अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।। पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।। जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।। जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।। सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।। चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।। गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
soi rāvan kahuṃ bani sahāī | astuti karahiṃ sunāi sunāī || avasara jāni bibhīṣanu āvā | bhrātā carana sīsu tehiṃ nāvā || puni siru nāi baiṭha nija āsana | bolā bacana pāi anusāsana || jau kṛpāla pūँchihu mohi bātā | mati anurūpa kahuँ hita tātā || jo āpana cāhai kalyānā | sujasu sumati subha gati sukha nānā || so paranāri lilāra gosāīṃ | tajau cauthi ke canda ki nāī || caudaha bhuvana eka pati hoī | bhūta-droha tiṣṭai nahiṃ soī || guna sāgara nāgara nara joū | alapa lobha bhala kahai na koū ||
The same courtiers became Ravana’s ready support, praising him again and again aloud. Seeing the moment, Vibhishana came; he bowed his head at his brother’s feet. Bowing again, he sat in his own seat and, having received leave, spoke words of counsel: “If you, gracious one, ask me, I shall speak what suits my understanding, for your good. Whoever seeks his own welfare—good fame, right judgment, blessed destiny, and manifold happiness—should renounce another’s wife, O lord, as one would avoid even the faint fourth-day moon. Even if one were lord of the fourteen worlds, one who harms living beings cannot endure. And however ocean-like and urbane a man may be, even a little greed no one calls good.”
Verse 119 (दोहा/सोरठा)
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।
kāma krodha mada lobha saba nātha naraka ke pantha | saba parihari raghubīrahi bhajahu bhajahiṃ jehi santa ||38||
Lust, anger, pride, and greed—O lord—are all roads to hell. Abandon them all and adore Raghuvira, whom the saints adore.
Verse 120 (चौपाई)
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।। ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।। गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।। जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।। ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।। देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।। सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।। जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
tāta rāma nahiṃ nara bhūpālā | bhuvaneśvara kālahu kara kālā || brahma anāmaya aja bhagavaṃtā | byāpaka ajita anādi anaṃtā || go dvija dhenu deva hitakārī | kṛpāsindhu mānuṣa tanudhārī || jana rañjana bhañjana khala brātā | beda dharma racchaka sunu bhrātā || tāhi bayaru taji nāia māthā | pranaṭārati bhañjana raghunāthā || dehū nātha prabhu kahuṃ baidehī | bhajahu rāma binu hetu sanehī || sarana gaeṃ prabhu tāhu na tyāgā | bisva droha kṛta agha jehi lāgā || jāsu nāma traya tāpa nasāvan | soi prabhu pragaṭ samujhu jiyaṃ rāvan ||
Dear brother, Rama is no mere human king: he is the Lord of the worlds, who overmasters even Time. He is Brahman—stainless, unborn, the Blessed One—all-pervading, unconquerable, beginningless and endless. For the good of cows, Brahmins, the sacred herds, and the gods, the ocean of mercy has assumed a human body. He delights the good, shatters the wicked, and protects Vedic dharma—listen, brother. Abandon enmity toward him and bow your head: Raghu-natha destroys the suffering of those who surrender. Give Vaidehi back to the Lord; love and worship Rama without ulterior motive. The Lord never forsakes one who takes refuge—even if stained by sins born of treachery to the world. He whose Name removes the threefold afflictions—know him in your heart as the manifest Lord, O Ravana.
Verse 121 (दोहा/सोरठा)
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।। मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।
bāra bāra pada lāgauṃ binaya karauṃ dasasīsa | parihari māna moha mada bhajahu kosalādhīsa ||39(ka)|| muni pulasti nija sisa sana kahi paṭhaī yaha bāta | turata so maiṃ prabhu sana kahī pāi su-avasaru tāta ||39(kha)||
Again and again I touch your feet and make my plea, O Ten-headed one: abandon ego, delusion, and pride, and worship the Lord of Kosala. Sage Pulastya sent this very counsel to his disciple; at the first good opportunity, dear brother, I conveyed it to you.
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