उत्तरो भयविषण्णः — बृहन्नडेन धैर्योपदेशः
Uttara’s Panic and Bṛhannadā’s Stabilizing Counsel
उत्तर उवाच सैरन्ध्रि जानासि तथा युवानं नपुंसको नैव भवेद् यथासौ । अहं न शकनोमि बृहन्नलां शुभे वक्तुं स्वयं यच्छ हयान् ममेति वै,उत्तरने कहा--सैरन्ध्री! वह युवक ऐसे गुणोंसे विभूषित है कि वह नपुंसक नहीं हो सकता; इन बातोंको तुम अच्छी तरह जानती हो; [अतः तुम उससे कह दो, तो ठीक है।] शुभे! मैं स्वयं बृहन्नलासे नहीं कह सकता कि तुम मेरे घोड़ोंकी रास सँभालो
uttara uvāca—sairandhri jānāsi tathā yuvānaṃ napuṃsako naiva bhaved yathāsau | ahaṃ na śaknomi bṛhannalāṃ śubhe vaktuṃ svayaṃ yaccha hayān mameti vai ||
ອຸຕຕະຣະ ກ່າວວ່າ: “ໂອ ໄສຣັນທຣີ, ເຈົ້າຮູ້ດີວ່າ ຊາຍໜຸ່ມນັ້ນມີຄຸນລັກສະນະສູງສົ່ງ ຈົນບໍ່ອາດເປັນນະປຸງສະກະໄດ້ແທ້. ດັ່ງນັ້ນ ຖ້າເຈົ້າໄປບອກເຂົາ ກໍຈະເໝາະສົມ. ໂອ ນາງຜູ້ເປັນມງຄົດ, ຂ້ອຍບໍ່ອາດເວົ້າກັບ ບຣຶຫັນນະລາ ດ້ວຍຕົນເອງວ່າ ‘ຈົ່ງຄຸ້ມຄອງມ້າຂອງຂ້ອຍ’.”
उत्तर उवाच