Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
इस लोकमें जो तपस्या (सकामभावसे) की जाती है, उसका फल परलोकमें भोगा जाता है; परंतु जो ब्रह्मोपासक इस लोकमें निष्कामभावसे गुरुतर तपस्या करते हैं, वे इसी लोकमें तत्त्वज्ञानरूप फल प्राप्त करते हैं (और मुक्त हो जाते हैं)। इस प्रकार एक ही तपस्या ऋद्ध और समृद्धके भेदसे दो प्रकारकी है ।। धृतराष्ट उवाच कथं समृद्धमसमृद्धं तपो भवति केवलम् | सनत्सुजात तद् ब्रूहि यथा विद्याम तद् वयम्,धृतराष्ट्रने पूछा--सनत्सुजातजी! विशुद्ध भावयुक्त केवल तप ऐसा प्रभावशाली बढ़ा- चढ़ा कैसे हो जाता है? यह इस प्रकार कहिये, जिससे हम उसे समझ लें
dhṛtarāṣṭra uvāca | kathaṁ samṛddham asamṛddhaṁ tapo bhavati kevalam | sanatsujāta tad brūhi yathā vidyāma tad vayam ||
ທຣິຕະຣາດ ຖາມວ່າ: «ໂອ ສະນັດສຸຈາຕະ! ຕະປະທີ່ໂດຍຕົນມັນເປັນຢ່າງດຽວ ເປັນເຫດໃດຈຶ່ງກາຍເປັນ ‘ສົມບູນ’ ໃນກໍລະນີໜຶ່ງ ແລະ ‘ບໍ່ສົມບູນ’ ໃນອີກກໍລະນີໜຶ່ງ? ຂໍທ່ານອະທິບາຍໃຫ້ພວກເຮົາ ເພື່ອໃຫ້ເຂົ້າໃຈແທ້».
धृतराष्ट उवाच