धृतराष्ट्र-संजय संवादः — उपप्लव्यगमनाज्ञा
Dhṛtarāṣṭra–Saṃjaya Dialogue: Command to Proceed to Upaplavya
गिर्याश्रया दुर्गनिवासिनश्च योधा: पृथिव्यां कुलजातिशुद्धा: । म्लेच्छाश्व नानायुधवीर्यवन्त: समागता: पाण्डवार्थे निविष्टा:,पर्वतोंपर रहनेवाले, दुर्गम भूमिमें निवास करनेवाले एवं समतल भूमिके निवासी योद्धा, जो कुल और जातिकी दृष्टिसे बहुत शुद्ध हैं, वे तथा म्लेच्छ भी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र एवं बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो पाण्डवोंकी सहायताके लिये आये हैं और उनके शिविरमें निवास करते हैं क्योंकि श्रीकृष्ण इनको आत्माके समान प्रिय हैं। श्रीकृष्ण विद्वान् हैं और सदा पाण्डवोंके हितके कार्यमें लगे रहते हैं। संजय! तुम वहाँ एकत्र हुए पाण्डवों तथा सूंजयवंशी क्षत्रियोंसे और श्रीकृष्ण, सात्यकि, राजा विराट एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंसे भी मेरी ओरसे स्वास्थ्यका समाचार पूछना। इसके सिवा जैसा अवसर हो और जिसमें तुम्हें भरतवंशियोंका हित प्रतीत हो, वैसी बातें पाण्डवपक्षके लोगोंसे कहना। राजाओंके बीचमें ऐसा कोई वचन »/) 4 / 45 #्र' 77० 7 >०/६] ॥ ८ >> । 22.0 की 6 8. २२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें धृतराष्ट्रसंदेशविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ न चापश्यं कंचिदहं पृथिव्यां योध॑ सम॑ वाधिकमर्जुनेन । यस्यैकषष्टिनिशितास्ती क्षणधारा: सुवासस: सम्मतो हस्तवाप: मैंने इस पृथ्वीपर अर्जुनसे बढ़कर या उनके समान दूसरे किसी योद्धाको नहीं देखा है; क्योंकि जब वे एक बार अपने हाथोंसे धनुषपर शर-संधान करते हैं, तब उससे सुन्दर पंख और पैनी धारवाले इकसठ तीखे बाण प्रकट होते हैं
giryāśrayā durganivāsinaś ca yodhāḥ pṛthivyāṁ kulajātiśuddhāḥ | mlecchāś ca nānāyudhavīryavantaḥ samāgatāḥ pāṇḍavārthe niviṣṭāḥ ||
Vaiśampāyana said: Warriors of many kinds—those who dwell in mountain fastnesses, those who live in difficult and inaccessible regions, and those settled on the plains—men renowned on earth for the purity of their lineage and community, and even foreign tribesmen endowed with diverse weapons and martial prowess, have assembled and taken their place for the Pāṇḍavas’ cause. The verse underscores how, in a time of impending war, alliances form across geography and social boundaries, and how loyalty to a righteous cause can draw support even from those considered outsiders.
वैशम्पायन उवाच