Rukmī’s Offer of Aid and Arjuna’s Refusal (रुक्मिप्रस्तावः—अर्जुनप्रत्याख्यानम्)
ऑपनआ कराता बा अं षट्पज्चाशर्दाधेकशततमो< ध्याय: दुर्योधनके द्वारा भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर अभिषेक और कुरक्षेत्रमें पहुँचकर शिविर-निर्माण वैशम्पायन उवाच तत: शान्तनवं भीष्म प्राञ्जलिर्धुतराष्ट्रज: । सह सर्वर्महीपालैरिदं वचनमत्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन समस्त राजाओंके साथ शान्तनु-नन्दन भीष्मके पास जा हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला--
vaiśampāyana uvāca | tataḥ śāntanavaṁ bhīṣmaṁ prāñjalir dhṛtarāṣṭrajaḥ | saha sarvair mahīpālair idaṁ vacanam abravīt ||
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ຕໍ່ມາ ທຸຣະໂຍທະນະ ບຸດແຫ່ງທຣິຕະຣາດຣະ ໄດ້ເຂົ້າໄປຫາ ພີສະມະ ບຸດແຫ່ງສັນຕະນຸ ພ້ອມດ້ວຍບັນດາກະສັດທັງປວງ; ແລ້ວປະນົມມື ແລະກ່າວຖ້ອຍຄຳນີ້.
वैशम्पायन उवाच