Kaurava Mobilization at Kurukṣetra (Duryodhana Orders War Preparations) / कुरुक्षेत्रे धार्तराष्ट्र-सैन्यसज्जा
“जो अवस्था, शास्त्रज्ञान, धैर्य, कुल और स्वजनसमूह सभी दृष्टियोंसे बड़े हैं, जिनमें लज्जा, बल और श्री तीनों विद्यमान हैं, जो समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें प्रवीण हैं, जिन्हें महर्षि भरद्वाजसे अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त हुई है, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं दुर्धर्ष योद्धा हैं, महाबली भीष्म और द्रोणाचार्यसे सदा स्पर्धा रखते हैं, जो समस्त राजाओंके समूहकी प्रशंसाके पात्र हैं और युद्धके मुहानेपर खड़े हो समस्त सेनाओंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, बहुत-से पुत्र-पौत्रोंद्वारा घिरे रहनेके कारण जिनकी सैकड़ों शाखाओंसे सम्पन्न वृक्षकी भाँति शोभा होती है, जिन महाराजने रोषपूर्वक द्रोणाचार्यके विनाशके लिये पत्नीसहित घोर तपस्या की है, जो संग्रामभूमिमें सुशोभित होनेवाले शूरवीर हैं और हमलोगोंपर सदा ही पिताके समान स्नेह रखते हैं, वे हमारे श्वशुर भूपालशिरोमणि ट्रुपद हमारी सेनाके प्रमुख भागका संचालन करें। मेरे विचारसे राजा ट्रुपद ही युद्धके लिये सम्मुख आये हुए द्रोणाचार्य और भीष्मपितामहका सामना कर सकते हैं; क्योंकि वे दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और द्रोणाचार्यके सखा हैं || १२-- १७ || माद्रीसुताभ्यामुक्ते तु स््वमते कुरुनन्दन: । वासविर्वासवसम: सव्यसाच्यब्रवीद् वच:,माद्रीकुमारोंक इस प्रकार अपना विचार प्रकट करनेपर कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले इन्द्रके समान पराक्रमी, इन्द्रपुत्र सव्यसाची अर्जुनने इस प्रकार कहा--
mādrīsutābhyām ukte tu svamate kurunandanaḥ | vāsavir vāsavasamaḥ savyasācy abravīd vacaḥ ||
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເມື່ອບຸດທັງສອງຂອງມາດຣີ ໄດ້ເຜີຍຄວາມເຫັນອັນໄຕ່ຕອງຂອງຕົນແລ້ວ, ອາຣະຈຸນ—ສະວັຍະສາຈີ, ບຸດແຫ່ງອິນທຣະ, ຜູ້ມີພະລັງກ້າຫານເທົ່າອິນທຣະ ແລະເປັນຄວາມຊື່ນບານແກ່ວົງກຸຣຸ—ໄດ້ກ່າວຖ້ອຍຄໍາເຫຼົ່ານີ້.
वैशम्पायन उवाच