Udyoga Parva, Adhyāya 13: Śacī’s Delay, Deva-Counsel, and Indra’s Purification
भजस्व मां वरारोहे पतित्वे वरवर्णिनि । शल्य कहते हैं--युधिष्ठि!र!े उस समय देवराज नहुषने इन्द्राणीको देखकर कहा --'शुचिस्मिते! मैं तीनों लोकोंका स्वामी इन्द्र हूँ। उत्तम रूप-रंगवाली सुन्दरी! तुम मुझे अपना पति बना लो”,किंचित् कालमिदं देवा मर्षयध्वमतन्द्रिता: । देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले--“इन्द्र यज्ञोंद्वारा केवल मेरी ही आराधना करें, इससे मैं वज्रधारी इन्द्रको पवित्र कर दूँगा। पाकशासन इन्द्र पवित्र अश्वमेध यज्ञके द्वारा मेरी आराधना करके पुनः निर्भय हो देवेन्द्र-पदको प्राप्त कर लेंगे और खोटी बुद्धिवाला नहुष अपने कर्मोंसे ही नष्ट हो जायगा। देवताओ! तुम आलस्य छोड़कर कुछ कालतक और यह कष्ट सहन करो” ।। १३--१५ ह || श्रुत्वा विष्णो: शुभां सत्यां वाणी ताममृतोपमाम् भगवान् विष्णुकी यह शुभ, सत्य तथा अमृतके समान मधुर वाणी सुनकर गुरु तथा महर्षियोंसहित सब देवता उस स्थानपर गये, जहाँ भयसे व्याकुल हुए इन्द्र छिपकर रहते थे
bhajasva māṁ varārohe patitve varavarṇini |
ນະຫຸຊະ ຜູ້ຂຶ້ນຄອງອຳນາດແທນອິນທຣາ ໄດ້ເວົ້າກັບອິນທຣານີ ດ້ວຍອຳນາດອັນຢົກຕົນແລະຄຳຫວານລໍ້ລວງວ່າ: «ໂອ ນາງຜູ້ມີສະໂພກງາມ ແລະຜິວພັນອັນປະເສີດ, ຈົ່ງຮັບຂ້າເປັນຜົວ»។ ຖ້ອຍຄຳນີ້ສະທ້ອນຄວາມຕຶງຕັນແຫ່ງສິນທຳ: ອຳນາດທີ່ໄດ້ມາດ້ວຍໂອກາດ ຖືກນຳໄປກົດດັນຍິງຜູ້ຊອບທຳໃຫ້ເຂົ້າສູ່ສັນຍາທີ່ບໍ່ຊອບທຳ—ເປັນການຕັດກັນລະຫວ່າງຄວາມປາຖະໜາອັນບີບຄັ້ນ (ອະທັມ) ແລະຄວາມສັດຊື່ຕໍ່ທັມມະ.
शल्य उवाच